Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 132

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
व꣣य꣡मि꣢न्द्र त्वा꣣य꣢वो꣣ऽभि꣡ प्र नो꣢꣯नुमो वृषन् । वि꣣द्धी꣢ त्वा३꣱स्य꣡ नो꣢ वसो ॥१३२॥

व꣣य꣢म् । इ꣣न्द्र । त्वाय꣡वः꣢ । अ꣣भि꣢ । प्र । नो꣣नुमः । वृषन् । विद्धि꣢ । तु । अ꣣स्य꣢ । नः꣣ । वसो ॥१३२॥

Mantra without Swara
वयमिन्द्र त्वायवोऽभि प्र नोनुमो वृषन् । विद्धी त्वा३स्य नो वसो ॥

वयम् । इन्द्र । त्वायवः । अभि । प्र । नोनुमः । वृषन् । विद्धि । तु । अस्य । नः । वसो ॥१३२॥

Samveda - Mantra Number : 132
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
सामान्यतः संसार के विषय ऐसे लुभावने हैं कि मनुष्य उनसे आकृष्ट होकर उनमें उलझ जाता है। धन ही उसका आराध्य देव बन जाता है और सभी साधनों से वह उसके सञ्चय में जुट जाता है। सांसारिक भोग आपातरमणीय हैं। ये विषय प्रारम्भ में अमृतोपम लगते हुए भी परिणाम में विषतुल्य होते हैं। हमारी सभी इन्द्रिय - शक्तियों को ये जीर्ण कर देते हैं। इस प्रकार इन सांसारिक विषयों के परिणाम को देखता व सोचता हुआ व्यक्ति कभी भी इनकी आकांक्षा नहीं कर सकता।

काम-क्रोध को वशीभूत करनेवाला 'वसिष्ठ' भी कहता है कि हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो! (वयम्)=हम सब (त्वायवः) = तुझे ही चाहनेवाले हैं। हे (वृषन्) = सुखों की वर्षा करनेवाले प्रभो! (अभि) = आपको लक्ष्य करके हम (प्रनोनुमः) = बारम्बार स्तुति करते हैं। आप परमैश्वर्यशाली हैं और सब सुखों की वर्षा करनेवाले हैं, अतः आपको पाकर किस वस्तु की कमी रह जाएगी? वे वस्तुएँ सान्त हैं, आप अनन्त हैं। सान्त के लिए अनन्त को छोड़ना बुद्धिमत्ता नहीं हो सकती। ये सान्त भोग्य पदार्थ कितने भी मधुर व आकर्षक हों, परन्तु हमने तो निश्चय कर लिया है कि आपको ही पाना है। हे (वसो) = उत्तम निवास के साधक प्रभो! (नः) = हमारे (अस्य) = इस निश्चय को (तु) = तो (विद्धि) = आप समझ लीजिए। हमें आत्मा व परमात्मा के तत्त्व को ही जानना है–विषयों की हमें चाहना नहीं। इस चाह को वशीभूत करके ही मैं इस मन्त्र का ऋषि ‘वसिष्ठ’ बना हूँ और वसिष्ठ बनने के लिए ही 'मैत्रावरुणि' = प्राणापान की साधना करनेवाला हुआ हूँ। 
Essence
हमारा यह निश्चय हो कि हमें प्रभु को पाना है। उसके लिए हम वसिष्ठ बनें।
Subject
हमें तो आत्मा को ही अपनाना है