Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1307

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म꣣हा꣢꣫ꣳ इन्द्रो꣣ य꣡ ओज꣢꣯सा प꣣र्ज꣡न्यो꣢ वृष्टि꣣मा꣡ꣳ इ꣢व । स्तो꣡मै꣢र्व꣣त्स꣡स्य꣢ वावृधे ॥१३०७॥

म꣣हा꣢न् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । यः । ओ꣡ज꣢꣯सा । प꣣र्ज꣡न्यः꣢ । वृ꣣ष्टिमा꣢न् । इ꣣व । स्तो꣡मैः꣢꣯ । व꣣त्स꣡स्य꣢ । वा꣣वृधे ॥१३०७॥

Mantra without Swara
महाꣳ इन्द्रो य ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमाꣳ इव । स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे ॥

महान् । इन्द्रः । यः । ओजसा । पर्जन्यः । वृष्टिमान् । इव । स्तोमैः । वत्सस्य । वावृधे ॥१३०७॥

Samveda - Mantra Number : 1307
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (यः) = जो (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली, सर्वशक्तिमान् प्रभु (ओजसा) = अपने ओज के द्वारा (महान्) = बड़े हैं, पूजनीय हैं। प्रभु की शक्ति अनन्त है । जब कभी एक वैज्ञानिक प्रभु से निर्मित सूर्यादि पिण्डों का अध्ययन करता है तब उसका उनके निर्माता के प्रति नतमस्तक हो जाना स्वाभाविक ही है । २. वे प्रभु (वृष्टिमान् पर्जन्यः इव) = वृष्टिवाले बादल की भाँति हैं। जैसे एक वृष्टिवाला बादल चारों ओर शान्ति का विस्तार करके [परां तृप्तिं जनयति] एक उत्कृष्ट सन्तोष उत्पन्न करता है उसी प्रकार प्रभु भी स्तोता के हृदय में एक अद्भुत शान्ति उत्पन्न करते हैं । ३. ये प्रभु (वत्सस्य) = वेदमन्त्रों का उच्चारण करनेवाले [वदतीति वत्सः] के (स्तोमैः) = स्तोत्रों से (वावृधे) = निरन्तर बढ़ाये जाते हैं । प्रभु का स्तोता प्रभु की महिमा को उच्चारण द्वारा प्रकाशित करता है । उच्चारण द्वारा ही नहीं, यह अपने जीवन के द्वारा प्रभु की महिमा को बढ़ाता है। लोग जब इसके शान्त, दिव्य जीवन को देखते हैं तब उनका प्रभु के प्रति विश्वास बढ़ता है।
Essence
हमारा जीवन प्रभु की महिमा का प्रकाश करनेवाला हो ।
Subject
वत्स के स्तोम