Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1304

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ꣡ग꣢न्म म꣣हा꣡ नम꣢꣯सा꣣ य꣡वि꣢ष्ठं꣣ यो꣢ दी꣣दा꣢य꣣ स꣡मि꣢द्धः꣣ स्वे꣡ दु꣢रो꣣णे꣢ । चि꣣त्र꣡भा꣢नु꣣ꣳ रो꣡द꣢सी अ꣣न्त꣢रु꣣र्वी꣡ स्वा꣢हुतं वि꣣श्व꣡तः꣢ प्र꣣त्य꣡ञ्च꣢म् ॥१३०४॥

अ꣡ग꣢꣯न्म । म꣣हा꣢ । न꣡म꣢꣯सा । य꣡वि꣢꣯ष्ठम् । यः । दी꣣दा꣡य꣢ । स꣡मि꣢꣯द्धः । सम् । इ꣣द्धः । स्वे꣢ । दु꣣रोणे꣢ । दुः꣣ । ओने꣢ । चि꣣त्र꣡भा꣢नुम् । चि꣣त्र꣢ । भा꣣नुम् । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । अ꣣न्तः꣢ । उ꣣र्वी꣡इति꣢ । स्वा꣡हु꣢तम् । सु । आ꣣हुतम् । वि꣡श्व꣢तः । प्र꣣त्य꣡ञ्च꣢म् । प्र꣣ति । अ꣡ञ्च꣢꣯म् ॥१३०४॥

Mantra without Swara
अगन्म महा नमसा यविष्ठं यो दीदाय समिद्धः स्वे दुरोणे । चित्रभानुꣳ रोदसी अन्तरुर्वी स्वाहुतं विश्वतः प्रत्यञ्चम् ॥

अगन्म । महा । नमसा । यविष्ठम् । यः । दीदाय । समिद्धः । सम् । इद्धः । स्वे । दुरोणे । दुः । ओने । चित्रभानुम् । चित्र । भानुम् । रोदसीइति । अन्तः । उर्वीइति । स्वाहुतम् । सु । आहुतम् । विश्वतः । प्रत्यञ्चम् । प्रति । अञ्चम् ॥१३०४॥

Samveda - Mantra Number : 1304
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्राणापान की साधना करके मन व इन्द्रियों को वशीभूत करनेवाला “मैत्रावरुणि वसिष्ठ" कहता है कि हम (महा नमसा) = महान् नमन के द्वारा ‘अग्नि' नामक प्रभु को (अगन्म) = प्राप्त होते हैं प्रभु की प्राप्ति का सर्वोत्तम उपाय नमन =अभिमान का अभाव है। जितना - जितना हम नमन की ओर चलते हैं जितना - जितना हमारा 'मैंपन'–‘आपा' समाप्त होता जाता है उतना उतना हम प्रभु के समीप पहुँचते जाते हैं। पूर्ण नमनवाला ही प्रभु को पा सकता है, उस प्रभु को, जो – १. (यविष्ठम्) = युवतम हैं। अपने भक्तों को उत्तरोत्तर अशुभ से पृथक् करके [यु- अमिश्रण] शुभ से जोड़नेवाले [यु=मिश्रण] हैं । २. (यः) = जो प्रभु (स्वे दुरोणे) = अपने भक्त में जोकि [दुःखेन ओणितुं योग्यं कृच्छ्रेण to remove] आत्म-प्राप्ति के निश्चय से हटाया नहीं जा सकता, (समिद्धः) = दीप्त हुए हुए (दीदायम्) = चमकते हैं । नचिकेता के समान दृढ़ निश्चयी पुरुष को ही आत्मसाक्षात्कार हुआ करता है। ३. (चित्रभानुम्) - वे प्रभु अद्भुत दीप्तिवाले हैं। सहस्रों सूर्यों के समान उनकी दीप्ति है । ४. वे प्रभु (उर्वी रोदसी अन्त:) = इन विशाल द्युलोक व पृथिवीलोक के अन्दर व्याप्त हैं— सर्वव्यापक हैं ५. (स्वाहुतम्) = जीवहित के लिए स्व-अपना आहुतम् - सब-कुछ दे डालनेवाले हैं ‘य आत्मदा'=उन्होंने तो अपने को भी दिया हुआ है । ६. (विश्वतः प्रत्यञ्चम्) = जो प्रभु सब ओर जानेवाले हैं और जो सर्वत्र प्रतिपूजित होते हैं । ज्ञानी तो उस प्रभु का पूजन करते ही हैं अज्ञानी भी अविधिपूर्वक अन्य देवताओं की उपासना करते हुए उन्हीं प्रभु की पूजा कर रहे होते हैं। 
Essence
हम नमन के द्वारा प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनें ।
Subject
महान् नमन