Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1297

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- राहूगण आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣢ दे꣣वः꣢ क꣣वि꣡ने꣢षि꣣तो꣢३꣱ऽभि꣡ द्रोणा꣢꣯नि धावति । इ꣢न्दु꣣रि꣡न्द्रा꣢य म꣣ꣳह꣡य꣢न् ॥१२९७॥

सः꣢ । दे꣣वः꣢ । क꣣वि꣡ना꣢ । इ꣣षितः꣢ । अ꣣भि꣢ । द्रो꣡णा꣢꣯नि । धा꣣वति । इ꣡न्दुः꣢꣯ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । म꣣ꣳह꣡य꣢न् ॥१२९७॥

Mantra without Swara
स देवः कविनेषितो३ऽभि द्रोणानि धावति । इन्दुरिन्द्राय मꣳहयन् ॥

सः । देवः । कविना । इषितः । अभि । द्रोणानि । धावति । इन्दुः । इन्द्राय । मꣳहयन् ॥१२९७॥

Samveda - Mantra Number : 1297
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(सः) = वह राहूगण १. (कविना) = क्रान्तदर्शी प्रभु से – वेदरूपी महान् काव्य के रचयिता कवि से (इषितः) = सदा प्रेरणा को प्राप्त होता हुआ, (द्रोणानि) = अपने शरीरों को (अभिधावति) = अन्दर व बाहर से पवित्र कर डालता है। स्थूलशरीर को पवित्र करके सदा नीरोग बना रहता है, साथ ही सूक्ष्मशरीर की पवित्रता से इसकी इन्द्रियाँ शक्तिशाली, मन निर्मल व बुद्धि तीव्र हो जाती है । [धाव्-शोधन]।

२. इस शोधन के द्वारा यह (इन्दुः) = सोम का पान करनेवाला शक्ति सम्पन्न जीव (इन्द्राय) = परमैश्वर्यसम्पन्न सर्वशक्तिमान् प्रभु की प्राप्ति के लिए (मंहयन्) = अपनी उन्नति व वृद्धि कर रहा होता है [to grow], उस प्रभु की प्राप्ति के लिए यह मानस को दान की भावना से भर रहा होता है [to give= मंहते], उस प्रभु के दर्शन के लिए यह अपने मस्तिष्क को चमका रहा होता है [to shine मंहते] । 
Essence
प्रभु-प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि हम १. नीरोगता के द्वारा अपने पुरुषार्थ में वृद्धि करें [अपने बल को बढ़ाएँ], २. हमारा मन उदार व दान की प्रवृत्तिवाला हो तथा ३. हमारी बुद्धि ज्ञान की ज्योति से जगमगाये ।
Subject
मंहयन्, प्रभु से प्रेरित हुआ
Footnote
सूचनाः – यहाँ मंहयन् शब्द के तीन अर्थ हैं—

१. शरीर के बल की वृद्धि [to make grow], २. मन में देने की वृत्ति [to make give] तथा ३. बुद्धि की चमक [to make shine ] । यही तीन उपाय प्रभु-प्राप्ति के हैं। इनके लिए प्रयत्न करता हुआ ही जीव प्रभु-प्राप्ति के लिए बढ़ रहा होता है ।