Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1296

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- राहूगण आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣡ वृषा꣢꣯ सु꣣तो꣡ व꣢रिवो꣣वि꣡ददा꣢꣯भ्यः । सो꣢मो꣣ वा꣡ज꣢मिवासरत् ॥१२९६॥

सः । वृ꣡त्र꣢हा । वृ꣣त्र । हा꣢ । वृ꣡षा꣢꣯ । सु꣣तः꣢ । व꣣रिवोवि꣢त् । व꣣रिवः । वि꣢त् । अ꣡दा꣢꣯भ्यः । अ । दा꣣भ्यः । सो꣡मः꣢꣯ । वा꣡ज꣢꣯म् । इ꣣व । असरत् ॥१२९६॥

Mantra without Swara
स वृत्रहा वृषा सुतो वरिवोविददाभ्यः । सोमो वाजमिवासरत् ॥

सः । वृत्रहा । वृत्र । हा । वृषा । सुतः । वरिवोवित् । वरिवः । वित् । अदाभ्यः । अ । दाभ्यः । सोमः । वाजम् । इव । असरत् ॥१२९६॥

Samveda - Mantra Number : 1296
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(सः) = वह राहूगण १. (वृत्रहा) = ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं का विनाश करनेवाला बनता है। २. (वृषा) = वासनाओं के विनाश के कारण ही शक्तिशाली होता है। वासनाएँ ही तो शक्ति को जीर्ण करती हैं। वासनाओं के विनाश से शक्ति सुरक्षित रहती है। ३. इस सुरक्षित शक्ति से यह (सुतः) = निर्माण के कार्य में लगा रहता है 'सुतमस्यास्तीति' यज्ञादि के अन्दर सदा प्रवृत्त होता है । ४. इन निर्माण के कार्यों में तथा यज्ञों में लगा रहकर यह (वरिवोवित्) = धन प्राप्त करता है । निर्माण के कार्य धनैश्वर्य के उत्पादक तो होते ही हैं । ५. धन को प्राप्त हुआ हुआ वह व्यक्ति (अदाभ्यः) = न दबनेवाला व अहिंसित होता है । ६. 'दबता नहीं' का यह अभिप्राय नहीं कि यह अक्खड़ होता है। अक्खड़ होना तो दूर रहा, वह (सोमः) = अत्यन्त सौम्य व शान्त है । ७. यह सौम्य व्यक्ति (वाजम् इव) = अपनी शक्ति के अनुसार (असरत्) = उस प्रभु की ओर बढ़ता है। जितनी शक्ति होती है उसी के अनुपात में प्रभु की भी प्राप्ति होती है। (‘नायमात्माबलहीनेन लभ्यः'), निर्बल को प्रभु थोड़े ही मिलते हैं ?
Essence
जीव वृत्रहा बनकर वृत्र के विनाशक प्रभु को प्राप्त होता है। 
 
Subject
शक्ति के अनुपात में