Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1294

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- राहूगण आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣢ वा꣣जी꣡ रो꣢च꣣नं꣢ दि꣣वः꣡ पव꣢꣯मानो꣣ वि꣡ धा꣢वति । र꣣क्षोहा꣡ वार꣢꣯म꣣व्य꣡य꣢म् ॥१२९४॥

सः । वा꣣जी꣢ । रो꣣चन꣢म् । दि꣣वः꣢ । प꣡व꣢꣯मानः । वि । धा꣣वति । रक्षोहा꣢ । र꣣क्षः । हा꣢ । वा꣡र꣢꣯म् । अ꣣व्य꣡य꣢म् ॥१२९४॥

Mantra without Swara
स वाजी रोचनं दिवः पवमानो वि धावति । रक्षोहा वारमव्ययम् ॥

सः । वाजी । रोचनम् । दिवः । पवमानः । वि । धावति । रक्षोहा । रक्षः । हा । वारम् । अव्ययम् ॥१२९४॥

Samveda - Mantra Number : 1294
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(सः) = वह राहूगण १. (वाजी) = शक्तिशाली व गतिशील २. (दिवः) = ज्ञान की (रोचनम्) = दीप्ति को (विधावति) = विशेषरूप से प्राप्त होता है। जैसे शक्ति व गति ज्ञान की प्राप्ति में सहायक हैं उसी प्रकार यह ज्ञान (पवित्रता) = प्राप्ति में सहायक होता है, अत: वह राहूगण ज्ञान को प्राप्त करके ३. (पवमानः) = 1अपने जीवन को पवित्र करनेवाला होता है। ('नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते') ज्ञान के समान कोई पवित्र करनेवाली वस्तु नहीं है। पवित्रता का स्वरूप यह है कि ये ५. (रक्षोहा) = सब राक्षसी वृत्तियों का संहार करता है, अपने रमण के लिए यह कभी औरों का क्षय नहीं करता । ६. इस प्रकार का जीवन बनाकर यह (अव्ययम्) = कभी नष्ट न होनेवाले उस (वारम्) = वरणीय, आपत्तियों के निवारण करनेवाले प्रभु की ओर विधावति विशेषरूप से जाता है ।
Essence
मैं शक्तिशाली बनकर उस अविनाशी प्रभु की ओर गतिवाला होऊँ।
Subject
वाजी बनकर ' अव्यय वार' की ओर