Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1287

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣡ इन्द्रा꣢꣯य वा꣣य꣡वे꣢ स्व꣣र्जि꣡त्परि꣢꣯ षिच्यते । प꣣वि꣡त्रे꣢ दक्ष꣣सा꣡ध꣢नः ॥१२८७॥

ए꣡षः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । वा꣣य꣡वे꣢ । स्व꣣र्जि꣢त् । स्वः꣣ । जि꣢त् । प꣡रि꣢꣯ । सि꣣च्यते । पवि꣡त्रे꣢ । द꣣क्षसा꣡ध꣢नः । द꣣क्ष । सा꣡ध꣢꣯नः ॥१२८७॥

Mantra without Swara
एष इन्द्राय वायवे स्वर्जित्परि षिच्यते । पवित्रे दक्षसाधनः ॥

एषः । इन्द्राय । वायवे । स्वर्जित् । स्वः । जित् । परि । सिच्यते । पवित्रे । दक्षसाधनः । दक्ष । साधनः ॥१२८७॥

Samveda - Mantra Number : 1287
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (एषः) = यह नृमेध (पवित्रे) = उस पवित्र प्रभु में निवास करता हुआ (दक्षसाधनः) = उन्नति व बल का सिद्ध करनेवाला होता है । २. यह (स्वर्जित्) = स्वर्गलोक का विजय करता है, अर्थात् अपने जीवन को वास्तव में आनन्दमय बनाता है । ३. यह नृमेध (इन्द्राय) = इन्द्रत्व के लिए - परमैश्वर्य के लिए अथवा शत्रुओं के विदारण के लिए और (वायवे) = गतिशीलता के लिए (परिषिच्यते) = परिसिक्त होता है। इसके अन्दर शत्रुओं के विदारण का सामर्थ्य उत्पन्न हो जाता है और इसका जीवन बड़ा क्रियाशील–स्फूर्तिमय हो जाता है [दक्षः = बलम् – नि० २.९ ]।
Essence
प्रभु में निवास करते हुए हम उन्नति व शक्ति को सिद्ध करें। 
Subject
शक्ति का संचार