Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1286

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ क꣣वि꣢र꣣भि꣡ष्टु꣢तः प꣣वि꣢त्रे꣣ अ꣡धि꣢ तोशते । पु꣣ना꣢꣫नो घ्नन्नप꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥१२८६॥

ए꣣षः꣢ । क꣣विः꣢ । अ꣣भि꣡ष्टु꣢तः । अ꣣भि꣢ । स्तु꣣तः । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । तो꣣शते । पुनानः꣢ । घ्नन् । अ꣡प꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ ॥१२८६॥

Mantra without Swara
एष कविरभिष्टुतः पवित्रे अधि तोशते । पुनानो घ्नन्नप द्विषः ॥

एषः । कविः । अभिष्टुतः । अभि । स्तुतः । पवित्रे । अधि । तोशते । पुनानः । घ्नन् । अप । द्विषः ॥१२८६॥

Samveda - Mantra Number : 1286
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र में वर्णन था कि प्रियमेध ज्ञानी बनकर भी मनुष्यों के साथ ही निवास करनेवाला होता है— उनसे दूर नहीं भाग जाता । यह मनुष्यों के साथ निवास करने के कारण ही 'नृ-मेध'=मनुष्यों से मेलवाला कहलाता है । सदा मानव हितैषी कार्यों में लगे रहने से यह 'आङ्गिरस' शक्तिशाली बना रहता है। १. (एषः) = यह नृमेध (कवि:) = ज्ञान - सूर्योदय के कारण क्रान्तदर्शी है – वस्तुतत्त्व को जाननेवाला है। (अभिष्टुतः) = हित के कार्यों में लगे होने से सदा चारों ओर इसकी स्तुति होती है । अथवा (अभि) = दोनों ओर सोते-जागते [स्तुतमस्य] यह प्रभु का स्तवन करनेवाला होता है । २. इस प्रभु-स्तवन से यह (पवित्रे अधि) = उस पवित्र प्रभु में (तोशते) = सब कामादि वासनाओं का संहार कर देता है [तुष to kill]। ३. (पुनान:) = इस प्रकार यह अपने को निरन्तर पवित्र करता हुआ ४. (द्विषः) = द्वेष की भावनाओं को अपघ्नन्-अपने से दूर नष्ट कर देता है । एवं, नृमेध अपने जीवन में क्रान्तदर्शी बनकर निरन्तर प्रभु-स्तवन करता हुआ उस पवित्र प्रभु में स्थित होकर वासनाओं का विनाश कर डालता है—अपने को पवित्र कर लेता है और द्वेष की भावनाओं को दूर कर देता है।
Essence
हम प्रभु का स्मरण करें और द्वेष से दूर रहें ।
Subject
द्वेष से दूर