Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1283

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢꣫ वृषा꣣ क꣡नि꣢क्रदद्द꣣श꣡भि꣢र्जा꣣मि꣡भि꣢र्य꣣तः꣢ । अ꣣भि꣡ द्रोणा꣢꣯नि धावति ॥१२८३॥

ए꣣षः꣢ । वृ꣡षा꣢꣯ । क꣡नि꣢꣯क्रदत् । द꣣श꣡भिः꣢ । जा꣣मि꣡भिः꣢ । य꣣तः꣢ । अ꣣भि꣢ । द्रो꣡णा꣢꣯नि । धा꣣वति ॥१२८३॥

Mantra without Swara
एष वृषा कनिक्रदद्दशभिर्जामिभिर्यतः । अभि द्रोणानि धावति ॥

एषः । वृषा । कनिक्रदत् । दशभिः । जामिभिः । यतः । अभि । द्रोणानि । धावति ॥१२८३॥

Samveda - Mantra Number : 1283
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(एषः) = यह प्रियमेध १. (वृषा) = शक्तिशाली होता है, वासनाओं का विनाश करके यह सोमशक्ति की रक्षा के द्वारा 'आङ्गिरस' अङ्ग-प्रत्यङ्ग में शक्तिवाला बनता है, वृषा होता है । २. (कनिक्रदत्) = वासनाओं से सदा बचे रहने के लिए यह प्रभु का खूब ही आह्वान करता है, सदा प्रभु के नामों का उच्चारण करता है । ३. (दशभिः जामिभिः) = दसों विषयों का अदन करने - [जभ=खाना]-वाली इन्द्रियों के दृष्टिकोण से यह (यतः) = संयत होता है। प्रभु-स्मरण के द्वारा यह इन्द्रियों को वश में करनेवाला बनता है और ४. (द्रोणानि) = गति के आधारभूत शरीरों - अपने [स्थूल व सूक्ष्म दोनों ही शरीरों को] (अभिधावति) = पवित्र कर डालता है। प्रभु-भक्त का शरीर नीरोग होता है और मन व बुद्धि भी निर्मल होते हैं । यह अन्दर व बाहर दोनों ओर से पवित्र होता है। 
Essence
मैं प्रभु-स्मरण से जितेन्द्रिय बनूँ । जितेन्द्रिय बनकर पवित्र होऊँ, निर्मल बनूँ 
Subject
अन्तः व बाह्य पवित्रता