Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1280

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ वा꣣जी꣢ हि꣣तो꣡ नृभि꣢꣯र्विश्व꣣वि꣡न्मन꣢꣯स꣣स्प꣡तिः꣢ । अ꣢व्यं꣣ वा꣢रं꣣ वि꣡ धा꣢वति ॥१२८०॥

ए꣣षः꣢ । वा꣣जी꣢ । हि꣣तः꣢ । नृ꣡भिः꣢꣯ । वि꣣श्ववि꣢त् । वि꣣श्व । वि꣢त् । म꣡नसः꣢꣯ । प꣡तिः꣢꣯ । अ꣡व्य꣢꣯म् । वा꣡र꣢꣯म् । वि । धा꣣वति ॥१२८०॥

Mantra without Swara
एष वाजी हितो नृभिर्विश्वविन्मनसस्पतिः । अव्यं वारं वि धावति ॥

एषः । वाजी । हितः । नृभिः । विश्ववित् । विश्व । वित् । मनसः । पतिः । अव्यम् । वारम् । वि । धावति ॥१२८०॥

Samveda - Mantra Number : 1280
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘प्रियमेध आङ्गिरस' है- प्रिय है मेधा जिसको, और जो अङ्ग-अङ्ग में रसवाला है— शक्तिशाली अङ्गोंवाला है। (एषः) = यह १. (वाजी) = शक्तिशाली बनता है [वाज—Power] चूँकि गतिशील है [वज गतौ] । २. (नृभिः हित:) = [ हेतु में तृतीया] मनुष्यजाति के उद्देश्य से यह उस-उस क्रिया में रक्खा हुआ होता है। इसकी प्रत्येक क्रिया मानव के हित के विचार से होती है। ३. (विश्ववित्) = यह सभी को जाननेवाला या प्राप्त होनेवाला होता है। अपने हित के कार्यों में लगा हुआ यह सभी का ध्यान करता है, सब दुःखियों के समीप स्वयं पहुँचनेवाला होता है । ४. (मनसः पतिः) = हित के कार्यों में लगा हुआ यह कभी अपने को क्रोध आदि का शिकार नहीं होने देता । यह अपने मन का पति होता है— मन को क़ाबू रखता है । जिनका हित करते हैं उनकी विरोधी क्रियाओं से क्रुद्ध हो उठना स्वाभाविक है, अतः यह प्रियमेध अपने मन को वश में करने का ध्यान करता है । ५. इन क्रोध इत्यादि के आक्रमण से बचने के लिए यह (अव्यम्) = रक्षा में उत्तम उस (वारम्) = वरणीय प्रभु की ओर (विधावति) = दौड़ता है। सदा उस प्रभु के चरणों में उपस्थित रहता है—तभी तो क्रोधादि के वशीभूत नहीं होता।
Essence
हमारी सब क्रियाएँ मानव के हित के लिए हों, हम अपने मन के पति बनें, प्रभुचरणों में प्रात:-सायं उपस्थित हों।
Subject
मानव हितैषी