Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1278

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- राहूगण आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢꣫ स्य पी꣣त꣡ये꣢ सु꣣तो꣡ हरि꣢꣯रर्षति धर्ण꣣सिः꣢ । क्र꣢न्द꣣न्यो꣡नि꣢म꣣भि꣢ प्रि꣣य꣢म् ॥१२७८॥

ए꣣षः꣢ । स्यः । पी꣣त꣡ये꣢ । सु꣣तः꣢ । ह꣣रिः꣢꣯ । अ꣣र्षति । धर्णसिः꣢ । क्र꣡न्द꣢꣯न् । यो꣡नि꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । प्रि꣣य꣢म् ॥१२७८॥

Mantra without Swara
एष स्य पीतये सुतो हरिरर्षति धर्णसिः । क्रन्दन्योनिमभि प्रियम् ॥

एषः । स्यः । पीतये । सुतः । हरिः । अर्षति । धर्णसिः । क्रन्दन् । योनिम् । अभि । प्रियम् ॥१२७८॥

Samveda - Mantra Number : 1278
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(एषः स्यः) = यह प्रभुभक्त (पीतये)- रक्षा के लिए सुतः = [सुतम् अस्य अस्तीति] निर्माणात्मक कार्यों में लगा हुआ और इन निर्माणात्मक कार्यों के द्वारा (हरिः) = सबके दुःखों का अपहरण करनेवाला (धर्णसिः) = सबके धारण करने के स्वभाववाला (अर्षति) = गति करता है । एक प्रभुभक्त अकर्मण्य तो होता ही नहीं। अकर्मण्य न होने से ही वह अपनी रक्षा कर पाता है। आलसी को ही वासनाएँ सताती हैं। यह सदा निर्माणात्मक कार्यों में लगता है, उनके द्वारा यह कितनों ही के दुःखों को दूर करनेवाला होता है और कितनों का ही धारण-पोषण करता है ।

यह अपने इस मार्ग पर चलता हुआ (प्रियम्) = सबके प्रिय (योनिम्) = मूल कारणभूत प्रभु का (अभिक्रन्दन्) = आह्वान करता है । प्रभु की प्रार्थना इसे सशक्त बनाती है और यह अव्याकुलता से अपने निर्माण-कार्यों में लगा रहता है। किसी भी प्रकार का कोई विघ्न इसे अपने मार्ग पर बढ़ने से रोक नहीं पाता।
Essence
प्रभुभक्त सदा निर्माणात्मक कार्यों द्वारा 'सर्वभूतहिते रत:' रहता है।
Subject
प्रभु का आह्वान करते हुए