Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1277

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- राहूगण आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢꣫ स्य मद्यो꣣ र꣡सोऽव꣢꣯ चष्टे दि꣣वः꣡ शिशुः꣢꣯ । य꣢꣫ इन्दु꣣र्वा꣢र꣣मा꣡वि꣢शत् ॥१२७७॥

ए꣣षः꣢ । स्यः । म꣡द्यः꣢꣯ । र꣡सः꣢꣯ । अ꣡व꣢꣯ । च꣣ष्टे । दिवः꣢ । शि꣡शुः꣢꣯ । यः । इ꣡न्दुः꣢꣯ । वा꣡र꣢꣯म् । आ꣡वि꣢꣯शत् । आ꣣ । अ꣡वि꣢꣯शत् ॥१२७७॥

Mantra without Swara
एष स्य मद्यो रसोऽव चष्टे दिवः शिशुः । य इन्दुर्वारमाविशत् ॥

एषः । स्यः । मद्यः । रसः । अव । चष्टे । दिवः । शिशुः । यः । इन्दुः । वारम् । आविशत् । आ । अविशत् ॥१२७७॥

Samveda - Mantra Number : 1277
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(एषः स्यः) = यह भक्त १. (मद्यः) = सबको उल्लसित करनेवाला, २. (रसः) = रसमय – अत्यन्त मधुरवाणीवाला, ३. (दिवः शिशुः) = ज्ञान देनेवाला [शिशीते- ददाति] (अवचष्टे) = नीचे की ओर देखता है, अर्थात् सदा विनीत ही बना रहता है ('ब्रह्मणा अर्वाङ् विपश्यति') ज्ञान से सदा विनीत बनता है। ४. (यः) = जो (इन्दुः) = शक्तिशाली बना हुआ (वारम्) = उस वरणीय परमात्मा में (आविशत्) = प्रवेश करता है । जो परमात्मा में प्रवेश करता है - खाते-पीते, सोते-जागते उस प्रभु का स्मरण करता है, वह स्वयं तो उल्लासवाला होता ही है औरों को भी उल्लासयुक्त करता है। इसकी वाणी में रस होता है, मधुर वाणी से ही यह ज्ञान का प्रचार करता है। ऊँची-से-ऊँची स्थिति में होने पर भी इसे गर्व नहीं होता। सदा नीचे देखनेवाला होता है ।
 
Essence
मैं प्रभु में प्रवेश करूँ तथा नम्र बनूँ ।
Subject
प्रभु में प्रवेश व नम्रता