Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1270

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ रु꣣क्मि꣡भि꣢रीयते वा꣣जी꣢ शु꣣भ्रे꣡भि꣢र꣣ꣳशु꣡भिः꣢ । प꣢तिः꣣ सि꣡न्धू꣢नां꣣ भ꣡व꣢न् ॥१२७०॥

ए꣣षः꣢ । रु꣣क्मि꣡भिः꣣ । ई꣣यते । वाजी꣢ । शु꣣भ्रे꣡भिः꣢ । अ꣣ꣳशु꣡भिः꣢ । प꣡तिः꣢꣯ । सि꣡न्धू꣢꣯नाम् । भ꣡व꣢꣯न् ॥१२७०॥

Mantra without Swara
एष रुक्मिभिरीयते वाजी शुभ्रेभिरꣳशुभिः । पतिः सिन्धूनां भवन् ॥

एषः । रुक्मिभिः । ईयते । वाजी । शुभ्रेभिः । अꣳशुभिः । पतिः । सिन्धूनाम् । भवन् ॥१२७०॥

Samveda - Mantra Number : 1270
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(एषः) = यह विषयों से अबद्ध जीव (सिन्धूनाम्-स्यन्दमान) = बहने के स्वभाववाले जलों-वीर्यों [आपो रेतो भूत्वा० ] का (पतिः) = रक्षक (भवन्) = होता हुआ (वाजी) = शक्तिशाली बनकर (रुक्मिभिः) = स्वर्ण के समान देदीप्यमान (शुभ्रेभिः) = उज्ज्वल (अंशुभिः) = ज्ञान की किरणों से (इयते) = प्रभु की ओर जाता है – प्रभु को प्राप्त करता है ।

मनुष्य के जीवन की मौलिक बात यह है-  १. वह वीर्य की रक्षा करे – सिन्धुओं का पति बने । २. वीर्य-रक्षा का परिणाम यह है कि वह ‘वाजी'– बलवान् बनता है, ३. इसका ज्ञान उज्ज्वल होता है [शुभ्र-अंशु] और ४. यह परमात्मा को प्राप्त करता है ।
Essence
मैं सिन्धुपति बनूँ, वाजी होऊँ, उज्ज्वल ज्ञान- किरणों से प्रभु का साक्षात्कार करूँ।
Subject
सिन्धुपति का प्रभु दर्शन