Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1269

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ हि꣣तो꣡ वि नी꣢꣯यते꣣ऽन्तः꣢ शु꣣न्ध्या꣡व꣢ता प꣣था꣢ । य꣡दी꣢ तु꣣ञ्ज꣢न्ति꣣ भू꣡र्ण꣢यः ॥१२६९॥

ए꣣षः꣢ । हि꣣तः꣢ । वि । नी꣣यते । अन्त꣡रिति꣢ । शु꣣न्ध्या꣡व꣢ता । प꣣था꣢ । य꣡दि꣢꣯ । तु꣣ञ्ज꣡न्ति꣢ । भू꣡र्ण꣢꣯यः ॥१२६९॥

Mantra without Swara
एष हितो वि नीयतेऽन्तः शुन्ध्यावता पथा । यदी तुञ्जन्ति भूर्णयः ॥

एषः । हितः । वि । नीयते । अन्तरिति । शुन्ध्यावता । पथा । यदि । तुञ्जन्ति । भूर्णयः ॥१२६९॥

Samveda - Mantra Number : 1269
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(एषः) = यह (अन्तः हितः) = अन्दर ही रक्खा हुआ प्रभु (शुन्ध्यावता) = शुद्धिवाले (पथा) = मार्ग से (विनीयते) = प्राप्त किया जाता है, (यत्) = जब (ई) = निश्चय से (भूर्णय:) = औरों का भरण-पोषण करनेवाले व्यक्ति (तुञ्जन्ति) [नि० ३.२०.९ दान] = दान देते हैं ।

प्रभु-प्राप्ति आत्मशुद्धि से होती है और आत्मशुद्धि दान देने से होती है। दान ‘व्यसनवृक्ष' के मूलभूत लोभ को नष्ट कर देता है और इस प्रकार मनुष्य को शुद्ध मनोवृत्तिवाला बनाता है । यह शुद्ध मनोवृत्तिवाला पुरुष ही प्रभु के दर्शन कर पाता है। प्रभु तो हृदय के अन्दर ही वर्त्तमान हैं, हृदय की मलिनता उसका दर्शन नहीं होने देती । हृदय शुद्ध हुआ और दर्शन हुआ ।
Essence
दान से हृदय शुद्ध होता है और शुद्ध हृदय में प्रभु दर्शन हो पाता है ।
Subject
दान, हृदयशुद्धि, प्रभु-दर्शन