Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1268

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣तं꣡ मृ꣢जन्ति꣣ म꣢र्ज्य꣣मु꣢प꣣ द्रो꣡णे꣢ष्वा꣣य꣡वः꣢ । प्र꣣चक्राणं꣢ म꣣ही꣡रिषः꣢꣯ ॥१२६८॥

ए꣣त꣢म् । मृ꣣जन्ति । म꣡र्ज्य꣢꣯म् । उ꣡प꣢꣯ । द्रो꣡णे꣢꣯षु । आ꣣य꣡वः꣢ । प्र꣣चक्राण꣢म् । प्र꣣ । चक्राण꣢म् । म꣣हीः꣢ । इ꣡षः꣢꣯ ॥१२६८॥

Mantra without Swara
एतं मृजन्ति मर्ज्यमुप द्रोणेष्वायवः । प्रचक्राणं महीरिषः ॥

एतम् । मृजन्ति । मर्ज्यम् । उप । द्रोणेषु । आयवः । प्रचक्राणम् । प्र । चक्राणम् । महीः । इषः ॥१२६८॥

Samveda - Mantra Number : 1268
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(आयवः) = गतिशील पुरुष – क्रियाशील व्यक्ति (एतम्) = इस (मर्ज्यम्) = अन्वेषण करने योग्य [मृज् to seek], अपने हृदयों में अलंकृत करने योग्य प्रभु को द्रोणेषु इन गति के आधारभूत शरीरों में (उपमृजन्ति) = समीपता से शोधने का प्रयत्न करते हैं। उस प्रभु को जोकि (महीः इषः) = महान् प्रेरणाओं को (प्रचक्राणम्) = प्रकर्ष से कर रहे हैं ।

अन्त:स्थित प्रभु सदा उत्तम प्रेरणाएँ दे रहे हैं । यह हमारा दौर्भाग्य है कि हम उन्हें सुनते ही नहीं । आयु- गतिशील पुरुष ही अन्तःस्थ प्रभु का साक्षात्कार करते हैं और उसकी वाणी को सुन पाते हैं। यहाँ — शरीर में ही उस प्रभु का दर्शन होना है। शरीर को द्रोण कहा है, क्योंकि यही इन्द्रियों, मन व बुद्धि का आधार है, जैसेकि द्रोणपात्र पानी आदि का आधार बनता है । अथवा सारी गति इस शरीर में ही होती है, इसलिए भी इसे 'द्रोण' कहा है, [द्रु गतौ] । जब मनुष्य का झुकाव प्रभु की ओर होता है तब वह प्रभु की महनीय प्रेरणाओं को सुनता है ।
Essence
हम प्रभु को ही मृग्य - अन्वेषणीय पदार्थ समझें।
Subject
मृग्य का मृजन