Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1262

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स देवरातः कृत्रिमो वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢꣫ दिवं꣣ वि꣡ धा꣢वति ति꣣रो꣡ रजा꣢꣯ꣳसि꣣ धा꣡र꣢या । प꣡व꣢मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥१२६२॥

ए꣣षः꣢ । दि꣡व꣢꣯म् । वि । धा꣣वति । तिरः꣢ । र꣡जा꣢꣯ꣳसि । धा꣡र꣢꣯या । प꣡व꣢꣯मानः । क꣡नि꣢꣯क्रदत् ॥१२६२॥

Mantra without Swara
एष दिवं वि धावति तिरो रजाꣳसि धारया । पवमानः कनिक्रदत् ॥

एषः । दिवम् । वि । धावति । तिरः । रजाꣳसि । धारया । पवमानः । कनिक्रदत् ॥१२६२॥

Samveda - Mantra Number : 1262
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जब प्रभु सब कुटिलताओं का शोधन कर देते हैं तब १. (एषः) = यह प्रभुभक्त (धारया) = [धारा=वाङ्] वेदवाणी के द्वारा (रजांसि तिर:) = रजोगुणों के परे (दिवम्) = प्रकाश की ओर (वि-धावति) = विशेषरूप से गति करता है [तिर:- across ] । २. रजोगुण से ऊपर उठकर सत्त्वगुण को प्राप्त करता हुआ यह भक्त (पवमानः) = अपने जीवन को पवित्र करनेवाला होता है। रजोगुण में ही सब राग-द्वेष थे, रजोगुण गया तो राग-द्वेष आदि मल भी नष्ट हो गये । ३. (कनिक्रदत्) = इसी रजोगुण से ऊपर उठने के उद्देश्य से ही यह निरन्तर उस प्रभु का आह्वान करता है । यह प्रभु का स्मरण ही उसे वह शक्ति प्राप्त कराएगा, जिससे यह अपनी सब कलुषित वासनाओं को जीत पाएगा।

वासनाओं का जीतना ही इसे उन्नति की ओर - प्रकाश की ओर, द्युलोक की ओर ले जाएगा।
Essence
हम प्रभु को पुकारें, जिससे हम पवित्र बनें । हम रजोगुण से ऊपर उठकर सत्त्वगुण में अवस्थित हों ।
Subject
प्रभु का आह्वान करते हुए