Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1261

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स देवरातः कृत्रिमो वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ दे꣣वो꣢ वि꣣पा꣢ कृ꣣तो꣢ऽति꣣ ह्व꣡रा꣢ꣳसि धावति । प꣡व꣢मानो꣣ अ꣡दा꣢भ्यः ॥१२६१॥

एषः꣢ । दे꣣वः꣢ । वि꣣पा꣢ । कृ꣣तः꣢ । अ꣡ति꣢꣯ । ह्व꣡रा꣢꣯ꣳसि । धा꣣वति । प꣡व꣢꣯मानः । अ꣡दा꣢꣯भ्यः । अ । दा꣣भ्यः ॥१२६१॥

Mantra without Swara
एष देवो विपा कृतोऽति ह्वराꣳसि धावति । पवमानो अदाभ्यः ॥

एषः । देवः । विपा । कृतः । अति । ह्वराꣳसि । धावति । पवमानः । अदाभ्यः । अ । दाभ्यः ॥१२६१॥

Samveda - Mantra Number : 1261
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(एष: देव) = दिव्यता के पुञ्ज ये प्रभु (विपा) = स्तोता - मेधावी पुरुष से (कृतः) = अपने हृदय-स्थली में निवास कराये जाने पर (ह्वरांसि अतिधावति) = सब कुटिलताओं को खूब अच्छी प्रकार [अति पूजार्थे] धो डालते हैं [धाव्-शुद्धि] । वे प्रभु तो हैं ही (पवमानः) = पवित्र करनेवाले और वे हैं भी तो (अदाभ्यः) = किसी से न दबनेवाले । प्रभु को उसके कार्य से कोई रोक थोड़े ही सकता है ? प्रभु चाहते हैं तो अपने भक्त को पूर्ण शुद्ध कर देते हैं । प्रभु की आराधना के उपाय 'ज्ञानी बनना तथा उसके गुणों के स्तवन के द्वारा अपनी लक्ष्य-दृष्टि को न भूलना' ही है। 
Essence
हम मेधावी स्तोता बनकर कुटिलताओं का सफ़ाया कर डालें ।
Subject
स्तुत प्रभु क्या करते हैं ?