Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1260

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स देवरातः कृत्रिमो वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ दे꣣वो꣡ वि꣢प꣣न्यु꣢भिः꣣ प꣡व꣢मान ऋता꣣यु꣡भिः꣢ । ह꣢रि꣣र्वा꣡जा꣢य मृज्यते ॥१२६०॥

ए꣡षः꣢ । दे꣣वः꣢ । वि꣣पन्यु꣡भिः꣢ । प꣡व꣢꣯मानः । ऋ꣣तायु꣡भिः꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । वा꣡जा꣢꣯य । मृ꣣ज्यते ॥१२६०॥

Mantra without Swara
एष देवो विपन्युभिः पवमान ऋतायुभिः । हरिर्वाजाय मृज्यते ॥

एषः । देवः । विपन्युभिः । पवमानः । ऋतायुभिः । हरिः । वाजाय । मृज्यते ॥१२६०॥

Samveda - Mantra Number : 1260
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(एषः) = यह देव—अपने अन्दर दिव्यता बढ़ानेवाला, (पवमानः) = अपने को पवित्र बनाने के = स्वभाववाला, (हरि:) = परन्तु इन्द्रियों के द्वारा निरन्तर विषयों में हरण किया जानेवाला आत्मा (वाजाय) = शक्ति व ज्ञान-प्राप्ति के लिए (मृज्यते) = शुद्ध किया जाता है। किनसे १. (विपन्युभिः) = विशेषरूप से उस प्रभु की स्तुति करनेवालों से तथा २. (ऋतायुभिः) = ऋत को चाहनेवालों से ।

आत्मा ‘देव' है—चित् होने से ज्ञानमय है, यह पवमान–पवित्र है, परन्तु प्रबल इन्द्रियसमूह इसे विषयों में हर ले जाता है तो यह मलिन-सा हो जाता है । जब जीव यह चाहता है कि उसे शक्ति व ज्ञान प्राप्त हो, अर्थात् उसका शरीर सशक्त हो तथा उसका मस्तिष्क ज्ञान से परिपूर्ण हो तब वह अपना शोधन करता है – विषयपङ्क से अपने को निकालने का प्रयत्न करता है । विषयपङ्क से निकलने के उपाय यही हैं कि १. ‘विपन्यु’ बने= प्रभु का विशेषरूप से स्तोता हो तथा २. ऋतायु-सत्य व नियमितता को अपने जीवन में लाने के लिए यत्नशील हो ।
Essence
विपन्यु व ऋतायु ही आत्मशुद्धि कर पाते हैं।
Subject
आत्म-शोधक कौन ?