Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1259

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स देवरातः कृत्रिमो वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ दे꣣वो꣡ र꣢थर्यति꣣ प꣡व꣢मानो दिशस्यति । आ꣣वि꣡ष्कृ꣢णोति वग्व꣣नु꣢म् ॥१२५९॥

एषः꣢ । दे꣣वः꣢ । र꣣थर्यति । प꣡व꣢꣯मानः । दि꣣शस्यति । आविः꣢ । आ꣣ । विः꣢ । कृ꣣णोति । वग्वनु꣢म् ॥१२५९॥

Mantra without Swara
एष देवो रथर्यति पवमानो दिशस्यति । आविष्कृणोति वग्वनुम् ॥

एषः । देवः । रथर्यति । पवमानः । दिशस्यति । आविः । आ । विः । कृणोति । वग्वनुम् ॥१२५९॥

Samveda - Mantra Number : 1259
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (एषः) = यह (देवः) = पूर्ण ज्ञान से द्योतमान [द्युति], सब व्यवहारों के साधक [व्यवहार] प्रभु (रथर्यति) = [रथं कामयते]=भक्त के रथ को चाहते हैं, अर्थात् भक्त के रथ का वहन करने के लिए उसके सारथि बनते हैं । २. (पवमानः) = भक्त के जीवन को निरन्तर पवित्र करनेवाले प्रभु (दिशस्यति) = [दिशस्य=to direct] उसका ठीक मार्ग-प्रदर्शन करते हैं और उसे उन्नति के लिए सब आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त कराना चाहते हैं [दिश् = अतिसर्जने] । ३. इसी उद्देश्य से प्रभु हृदयस्थरूप से (वग्वनुम्) = वेदवाणी को (आविष्कृणोति) = आविर्भूत करते हैं । यह वेदवाणी मार्ग-दर्शन तो करती ही है, साथ ही सब विज्ञानों को बताकर सब साधनों को जुटाने में सक्षम बनाती है ।
Essence
प्रभु मेरे रथ के सारथि हों, मुझे उनका मार्ग दर्शन प्राप्त हो तथा मैं वेदवाणी को सुनूँ, जिसे प्रभु निरन्तर प्रकट कर रहे हैं ।
Subject
प्रभु भक्त के सारथि बनते हैं