Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1258

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स देवरातः कृत्रिमो वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣡ विश्वा꣢꣯नि꣣ वा꣢र्या꣣ शू꣢रो꣣ य꣡न्नि꣢व꣣ स꣡त्व꣢भिः । प꣡व꣢मानः सिषासति ॥१२५८॥

ए꣣षः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯नि । वा꣡र्या꣢꣯ । शू꣡रः꣢꣯ । यन् । इ꣣व । स꣡त्व꣢꣯भिः । प꣡व꣢꣯मानः । सि꣣षासति ॥१२५८॥

Mantra without Swara
एष विश्वानि वार्या शूरो यन्निव सत्वभिः । पवमानः सिषासति ॥

एषः । विश्वानि । वार्या । शूरः । यन् । इव । सत्वभिः । पवमानः । सिषासति ॥१२५८॥

Samveda - Mantra Number : 1258
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(एषः) = यह प्रभु की उपासना करनेवाला जीव १. (शूरः) = [ शृ हिंसायाम् ] कामादि सब अशुभ वृत्तियों की हिंसा करनेवाला होता है। २. (सत्वभिः यन् इव) = यह सदा सात्त्विक वृत्तियों के साथ गति करता है। रजोगुण व तमोगुण को अभिभूत करके इसमें सत्त्वगुण प्रबल होता है । ३. (पवमानः) = यह अपने जीवन को पवित्र करने के स्वभाववाला होता है। इसका जीवन उत्तरोत्तर पवित्र होता जाता है। ४. पवित्र जीवनवाला होकर यह (विश्वानि वार्या सिषासति) = वरणीय वस्तुओं को पाना चाहता है। वह अवाञ्छनीय वस्तुओं की कामना से ऊपर उठ जाता है ।
Essence
प्रभु-उपासना हमें १. शूर, २. सात्त्विक, ३. पवित्र व ४. शुभ इच्छाओंवाला बनाती है।
Subject
उपासना के परिणाम