Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1257

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः स देवरातः कृत्रिमो वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣡ विप्रै꣢꣯र꣣भि꣡ष्टु꣢तो꣣ऽपो꣢ दे꣣वो꣡ वि गा꣢हते । द꣢ध꣣द्र꣡त्ना꣢नि दा꣣शु꣡षे꣢ ॥१२५७॥

ए꣣षः꣢ । वि꣡प्रैः꣢꣯ । वि । प्रैः꣣ । अभि꣡ष्टु꣢तः । अ꣣भि꣢ । स्तु꣣तः । अपः꣢ । दे꣣वः꣢ । वि । गा꣣हते । द꣡ध꣢꣯त् । र꣡त्ना꣢꣯नि । दा꣣शु꣡षे꣢ ॥१२५७॥

Mantra without Swara
एष विप्रैरभिष्टुतोऽपो देवो वि गाहते । दधद्रत्नानि दाशुषे ॥

एषः । विप्रैः । वि । प्रैः । अभिष्टुतः । अभि । स्तुतः । अपः । देवः । वि । गाहते । दधत् । रत्नानि । दाशुषे ॥१२५७॥

Samveda - Mantra Number : 1257
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. जीव शरीर में प्रवेश करता है और प्रभु जीवों में प्रविष्ट होकर रहते हैं, परन्तु कब ? जब (एषः) = यह सर्वव्यापक (देवः) = प्रभु (विप्रैः) = विशेषरूप से अपना पूरण करनेवालों से (अभिष्टुतः) = स्तुत होते हैं । वैसे तो वे प्रभु प्राणिमात्र में क्या भूतमात्र में रह रहे हैं, सर्वव्यापकता के नाते वे कण-कण में विद्यमान हैं, परन्तु प्रभु का प्रकाश तो इन स्तोताओं में ही होता है जो अपनी कमियों को दूर करते हैं । २. जब हम अपनी न्यूनताओं को दूर कर उस प्रभु की स्तुति करते हैं तब (देवः) = ये दिव्य प्रभु (अपः) = कर्मशील प्रजाओं में (विगाहते) = प्रवेश करते हैं, अर्थात् ये विप्र उस प्रभु का प्रकाश अपने अन्दर देखते हैं। ३. अन्त:- प्रविष्ट प्रभु (दाशुषे) = दाश्वान् के लिए (रत्नानि दधत्) = रत्नों को धारण करते हैं । जो व्यक्ति दान देता है तथा प्रभु के प्रति अपना समर्पण करता है, प्रभु उसे रमणीय धन प्राप्त कराते हैं ।
Essence
जीव का कल्याण इसी में है कि — १. वह ‘विप्र' बने - अपनी न्यूनताओं को दूर करके अपना पूरण करे, २. अप:- कर्मशील बने, ३. दाश्वान्- दाता और प्रभु के प्रति अर्पण करनेवाला हो। ऐसा करने पर ही यह वास्तविक सुख का निर्माण करनेवाला ‘शुन:शेप' होगा । गर्त=स्तुत्य प्रभु की ओर गति करनेवाला [अज्] यह सचमुच 'आजीगर्ति' हो जाएगा ।
Subject
प्रभु का प्रजाओं में प्रवेश [ तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ]