Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1254

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पराशरः शाक्त्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म꣡त्सि꣢ वा꣣यु꣢मि꣣ष्ट꣢ये꣣ रा꣡ध꣢से नो꣣ म꣡त्सि꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा पू꣣य꣡मा꣢नः । म꣢त्सि꣣ श꣢र्धो꣣ मा꣡रु꣢तं꣣ म꣡त्सि꣢ दे꣣वा꣢꣫न्मत्सि꣣ द्या꣡वा꣢पृथि꣣वी꣡ दे꣢व सोम ॥१२५४॥

म꣡त्सि꣢꣯ । वा꣣यु꣢म् । इ꣣ष्ट꣡ये꣢ । रा꣡ध꣢꣯से । नः꣣ । म꣡त्सि꣢꣯ । मि꣣त्रा꣢ । मि꣣ । त्रा꣢ । व꣡रु꣢꣯णा । पू꣣य꣡मा꣢नः । म꣡त्सि꣢꣯ । श꣡र्धः꣢꣯ । मा꣡रु꣢꣯तम् । म꣡त्सि꣢꣯ । दे꣣वा꣢न् । म꣡त्सि꣢꣯ । द्या꣡वा꣢꣯ । पृ꣣थि꣡वीइति꣢ । दे꣣व । सोम ॥१२५४॥

Mantra without Swara
मत्सि वायुमिष्टये राधसे नो मत्सि मित्रावरुणा पूयमानः । मत्सि शर्धो मारुतं मत्सि देवान्मत्सि द्यावापृथिवी देव सोम ॥

मत्सि । वायुम् । इष्टये । राधसे । नः । मत्सि । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । पूयमानः । मत्सि । शर्धः । मारुतम् । मत्सि । देवान् । मत्सि । द्यावा । पृथिवीइति । देव । सोम ॥१२५४॥

Samveda - Mantra Number : 1254
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मन्त्र का ऋषि ‘पराशर:' [परा=away, शृ हिंसा] = शत्रुओं को दूर हिंसित करनेवाला ‘शाक्त्यः शक्ति का पुत्र; शक्ति का पुञ्ज है । यह दिव्य गुणोंवाले सोम का स्मरण करता हुआ कहता है – १. हे (देव सोम) = दिव्य गुणों के पुञ्ज, दिव्य गुणों को जन्म देनेवाले सोम! तू (नः) = हममें से (वायुम्) = गतिशील व्यक्ति को [वा-गति] (इष्टये) = यज्ञादि उत्तम कर्मों के लिए तथा (राधसे) = संसिद्धि व सफलता के लिए (मत्सि) = आनन्दयुक्त करता है । भाव यह है कि गतिशील व्यक्ति ही वासनाओं से बचकर सोम की रक्षा कर पाता है। यह सुरक्षित सोम उसे यज्ञादि में प्रवृत्त करता है और सफलता का लाभ कराता है। २. हे सोम! तू (मित्रावरुणा) = प्राणापान की साधना करनेवालों को (पूयमान:) = पवित्र करता हुआ (मत्सि) = आनन्दित करता है। (प्राणापान) = प्राणायाम की साधना से ही ऊर्ध्वरेतस् बनना सम्भव है। (ऊर्ध्वरेतस्) = बनने पर शरीर में रोग व मन में द्वेषादि मालिन्यों का नाश हो जाता है । इस प्रकार यह सोम साधक के जीवन को पवित्र व आनन्दित करनेवाला होता है । ३. हे सोम ! तू (मारुतं शर्धः) = प्राणों के बल को (मत्सि) = गतिशील तथा प्राणापान-साधक में उल्लासमय बनाता है। सोम के सुरक्षित होने पर प्राणों का बल बढ़ता है और जीवन में उल्लास का संचार होता है । ४. हे सोम! तू (देवान् मत्सि) = ज्ञान प्राप्त करके चमकनेवालों को उल्लसित करता है। 'ज्ञान-प्राप्ति' में लगा रहना भी सोम की सुरक्षा का साधन है। सुरक्षित सोम ज्ञानवृद्धि का साधन बन जाता है । ५. हे देव (सोम) = दिव्य सोम ! तू (द्यावापृथिवी) = द्युलोक तथा पृथिवीलोक को मत्सि-तृप्त व प्रीणित करता है । द्युलोक मस्तिष्क है, पृथिवी शरीर । सोम मस्तिष्क को उल्लसित करता है मनुष्य को ज्ञान की दीप्तियाँ प्राप्त होने लगती हैं [Flashes of light] तथा शरीर की नीरोगता भी एक आनन्द का अनुभव कराती है। 
Essence
हम दिव्य गुणों के साधक सोम के महत्त्व को समझकर उसकी रक्षा के लिए १. गतिशील बनें, २. प्राणायाम करें, और ३. ज्ञान-प्राप्ति में लगे रहें । इससे हमारा सारा जीवन उल्लासमय हो उठेगा ।
Subject
उल्लासमय जीवन, जीवन का उल्लास