Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1252

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- जेता माधुच्छन्दसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ꣢न्द्र꣣मी꣡शा꣢न꣣मो꣡ज꣢सा꣣भि꣡ स्तोमै꣢꣯रनूषत । स꣣ह꣢स्रं꣣ य꣡स्य꣢ रा꣣त꣡य꣢ उ꣣त꣢ वा꣣ स꣢न्ति꣣ भू꣡य꣢सीः ॥१२५२॥

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ई꣡शा꣢꣯नम् । ओ꣡ज꣢꣯सा । अ꣣भि꣡ । स्तो꣡मैः꣢꣯ । अ꣣नूषत । स꣣ह꣡स्र꣢म् । य꣡स्य꣢꣯ । रा꣣त꣡यः꣢ । उ꣣त꣢ । वा꣣ । स꣡न्ति꣢꣯ । भू꣡य꣢꣯सीः ॥१२५२॥

Mantra without Swara
इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमैरनूषत । सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः ॥

इन्द्रम् । ईशानम् । ओजसा । अभि । स्तोमैः । अनूषत । सहस्रम् । यस्य । रातयः । उत । वा । सन्ति । भूयसीः ॥१२५२॥

Samveda - Mantra Number : 1252
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्य! प्रभु को (स्तोमैः) = स्तुतिसमूहों से अभि (अनूषत) = सब ओर स्तुत करो । वे प्रभु – १. (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यवाले हैं, २. (ओजसा ईशानम्) = अपने ओज से समस्त ब्रह्माण्ड का शासन करनेवाले हैं, ३. (यस्य रातयः) = जिसके दान (सहस्रम्) = हज़ारों हैं, जिस प्रभु ने उन्नति के लिए हमें शतश: पदार्थ प्राप्त कराये हैं, ४. (उत वा सन्ति भूयसी:) = जिस प्रभु के दान हज़ारों से भी अधिक हैं । वस्तुतः प्रभु ने जो पदार्थ हमारी उन्नति के लिए प्राप्त कराये हैं, उनकी कोई संख्या थोड़े ही है? उस अनन्तदानवाले प्रभु का हमें स्तवन करना ही चाहिए ।
Essence
वे प्रभु इन्द्र हैं, ईशान हैं, अनन्त दानोंवाले हैं। हम उन्हीं का स्तवन करें।
Subject
इन्द्र-स्तवन