Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1245

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उशना काव्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
क꣣वि꣡मि꣢व प्र꣣श꣢ꣳस्यं꣣ यं꣢ दे꣣वा꣢स꣣ इ꣡ति꣢ द्वि꣣ता꣢ । नि꣡ मर्त्ये꣢꣯ष्वाद꣣धुः꣢ ॥१२४५॥

क꣣वि꣢म् । इ꣣व । प्रश꣡ꣳस्य꣢म् । प्र꣣ । श꣡ꣳस्य꣢꣯म् । यम् । दे꣣वा꣡सः꣢ । इ꣡ति꣢꣯ । द्वि꣣ता꣢ । नि । म꣡र्त्ये꣢꣯षु । आ꣡दधुः꣢ । आ꣣ । दधुः꣢ ॥१२४५॥

Mantra without Swara
कविमिव प्रशꣳस्यं यं देवास इति द्विता । नि मर्त्येष्वादधुः ॥

कविम् । इव । प्रशꣳस्यम् । प्र । शꣳस्यम् । यम् । देवासः । इति । द्विता । नि । मर्त्येषु । आदधुः । आ । दधुः ॥१२४५॥

Samveda - Mantra Number : 1245
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र से 'स्तुषे' क्रिया को लाकर अर्थ इस प्रकार है कि मैं उस प्रभु का स्तवन करता हूँ (यम्) = जिसको (देवाः) = देवलोग १. (कविम् इव) = कवि की भाँति – हृदयस्थ रूपेण सब विद्याओं का उपदेश देनेवाले के रूप में [कौति सर्वा विद्याः] अथवा क्रान्तदर्शी अन्तर्यामी के रूप में तथा २. (प्रशंस्यम्) = प्रशंसा योग्य सब बातों के बीजरूप में जो-जो भी हमारे जीवन में सौन्दर्य का अंश है सब उस प्रभु के ही अंश के कारण है, (इति) = इस प्रकार (द्विता) = दो रूपों में (मर्त्येषु) = मनुष्यों में (नि आ दधुः) = निश्चय से स्थापित करते हैं।

विद्वान् लोग मनुष्यों में प्रभु को दो रूपों में देखते हैं एक तो 'कवि' के रूप में और दूसरा ‘प्रशंस्य’ रूप में। सब विद्याओं का ज्ञान देनेवाला वही अन्तर्यामी प्रभु है, वही हमारे जीवनों में सौंन्दर्यमात्र का बीज है ।
Essence
वे प्रभु 'कवि' हैं, 'प्रशंस्य' हैं ।
Subject
दो रूपों में