Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1243

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दि꣣वो꣢ ध꣣र्त्ता꣡सि꣢ शु꣣क्रः꣢ पी꣣यू꣡षः꣢ स꣣त्ये꣡ विध꣢꣯र्मन्वा꣣जी꣡ प꣢वस्व ॥१२४३॥

दि꣣वः꣢ । ध꣣र्त्ता꣢ । अ꣣सि । शुक्रः꣢ । पी꣣यू꣡षः꣢ । स꣣त्ये꣢ । वि꣡ध꣢꣯र्मन् । वि । ध꣣र्मन् । वाजी꣢ । प꣢वस्व ॥१२४३॥

Mantra without Swara
दिवो धर्त्तासि शुक्रः पीयूषः सत्ये विधर्मन्वाजी पवस्व ॥

दिवः । धर्त्ता । असि । शुक्रः । पीयूषः । सत्ये । विधर्मन् । वि । धर्मन् । वाजी । पवस्व ॥१२४३॥

Samveda - Mantra Number : 1243
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे सोम ! तू १. (दिव:) = प्रकाश का (धर्ता असि) = धारण करनेवाला है। ज्ञानाग्नि का तो ईंधन ही यह है। इसके अभाव में ज्ञानाग्नि बुझ जाती है । २. (शुक्र:) = तू दीप्तिमान् है । मन को द्वेषादि मलों से रहित करके चमका देनेवाला है। ३. (पीयूष:) = तू अमृत है। शरीर को रोगों से बचाकर तू असमय में मृत्यु का शिकार नहीं होने देता । ४. तू (सत्ये विधर्मन्) = अपने रक्षक को सत्य में धारण करनेवाला है। सोमरक्षक सत्यवादी तो होता ही है और इस सत्य का पालन करता हुआ वह सत्य प्रभु का पानेवाला बनता है । ५. (वाजी) = शक्ति देनेवाला होता हुआ तू (पवस्व) = हमारे शरीर में प्रवाहित हो । 
Essence
सोम ज्योति, नैर्मल्य व नीरोगता को देता है— सत्य हमें प्रभु में स्थापित करता है और हममें शक्ति का संचार करता है ।
Subject
सत्य में स्थिति