Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 123

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प꣡न्यं꣢पन्य꣣मि꣡त्सो꣢तार꣣ आ꣡ धा꣢वत꣣ म꣡द्या꣢य । सो꣡मं꣢ वी꣣रा꣢य꣣ शू꣡रा꣢य ॥१२३॥

प꣡न्य꣢꣯म्पन्यम् । प꣡न्य꣢꣯म् । प꣣न्यम् । इ꣢त् । सो꣣तारः । आ꣢ । धा꣣वत । म꣡द्या꣢꣯य । सो꣡म꣢꣯म् । वी꣣रा꣡य꣢ । शू꣡रा꣢꣯य ॥१२३॥

Mantra without Swara
पन्यंपन्यमित्सोतार आ धावत मद्याय । सोमं वीराय शूराय ॥

पन्यम्पन्यम् । पन्यम् । पन्यम् । इत् । सोतारः । आ । धावत । मद्याय । सोमम् । वीराय । शूराय ॥१२३॥

Samveda - Mantra Number : 123
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र में ज्ञान प्राप्ति के लिए भरपूर प्रयत्न करनेवाले ने प्रभु को उपालम्भ दिया था कि यही तेरी सर्वेश्वरता है कि मैं अब तक ज्ञानी नहीं बन पाया! यह उपालम्भ भी पूर्ण प्रयत्न के बाद ही दिया जा सकता है। वह प्रयत्न ही इस मन्त्र में संकेतित है।

इस मन्त्र का ऋषि ‘मेधातिथि काण्व' है- [मेधां प्रति अतति] जो निरन्तर मेधा-प्राप्ति के प्रयत्न में लगा हुआ हैई-कण-कण करके उसी के सञ्चय में जुटा है। यह मेधातिथि समझता है कि बुद्धि की सूक्ष्मता के लिए [vitality] वीर्यशक्ति की रक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है, उसी को मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि का ईंधन बनना है, यह मेधातिथि कहता है कि (सोतार:)=अपने में शक्ति का अभिषव करनेवाले प्रभु के प्यारो ! (पन्यंपन्यं इत्) = सचमुच स्तुति के योग्य [पन स्तुतौ] भोज्य पदार्थों को ही अपने भोजन का अङ्ग बनाओ और इस प्रकार (सोमम्) = अपनी वीर्यशक्ति को (आधावत) = शुद्ध बनाओ [धावु = to cleanse]। वस्तुतः सौम्य भोजनों से उत्पन्न वीर्यशक्ति ही शुद्ध व निर्विकार होती है, वही शरीर के अन्दर स्थिर रहती है। मांस-मदिरादि आग्नेय पदार्थों से उत्पन्न शक्ति का शरीर में स्थिरता से रहना सम्भव नहीं होता।

सौम्य भोजनों से उत्पन्न शक्ति शरीर में (मद्याय) = [मदी हर्षे] हर्ष के लिए होती है। संयत शक्तिवाला पुरुष सदा प्रसन्न व उल्लासमय रहता है। इसके अभाव में वह क्रोधी व चिड़चिड़े स्वभाव का हो जाता है | (वीराय) = यह शक्ति मनुष्य की वीरता के लिए होती है। संत वीर्यवाला व्यक्ति उदारता आदि गुणों से विभूषित होता है। उसकी मानस स्थली गुणों [virtues] के अंकुरित होने के लिए अनुकूल होती है। (शूराय) = यह अपनी बुराईयों [vices] की शीर्णता के लिए [शृ हिंसायाम्] समर्थ होता है। इसका मानस व्यसनों के लिए ऊसर भूमि हो जाता है। एवं, संयत शक्ति के तीन लाभ सुव्यक्त हैं।
Essence
सौम्य भोजनों से मैं संयमी होकर सदा मस्त, वीर व शूर बना रहूँ। 
Subject
सोम का शोधक