Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1227

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उचथ्य आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
दि꣣वः꣢ पी꣣यू꣡ष꣢मुत्त꣣म꣢꣫ꣳ सोम꣣मि꣡न्द्रा꣢य व꣣ज्रि꣡णे꣢ । सु꣣नो꣢ता꣣ म꣡धु꣢मत्तमम् ॥१२२७॥

दि꣣वः꣢ । पी꣣यू꣡ष꣢म् । उ꣣त्तम꣢म् । सो꣡म꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । व꣣ज्रि꣡णे꣢ । सु꣣नो꣡त꣢ । म꣡धु꣢꣯मत्तमम् ॥१२२७॥

Mantra without Swara
दिवः पीयूषमुत्तमꣳ सोममिन्द्राय वज्रिणे । सुनोता मधुमत्तमम् ॥

दिवः । पीयूषम् । उत्तमम् । सोमम् । इन्द्राय । वज्रिणे । सुनोत । मधुमत्तमम् ॥१२२७॥

Samveda - Mantra Number : 1227
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(सोमम्) = सोम को (सुनोत) = अपने अन्दर अभिषुत करो - उत्पन्न करो, जो सोमः – १. (दिवः पीयूषम्) = स्वर्ग का अमृत है। प्रसिद्धि है कि स्वर्गलोक में रहनेवाले देव अमृत का पान करते हैं । अमृतपान से ही वे अमर हैं— मृत्यु से ऊपर हैं। शरीर में उत्पन्न होनेवाला यह सोम ही अमृत हैइसका पान यही है कि इसे शरीर में ही व्याप्त करना । इसी का परिणाम स्वर्ग में निवास होता है। जीवन नीरोग रह, सुखी बनता है और मनुष्य रोगों से असमय में ही मर नहीं जाता । २. (उत्तमम्) = सोम उत्तम है—उत्+तम। मनुष्य को अधिक से अधिक उत्कर्ष तक ले जानेवाला है। इसकी रक्षा से जहाँ शरीर नीरोग और सबल बनता है, वहाँ बुद्धि सूक्ष्म होकर ज्ञान भी बहुत विशाल हो जाता है। ३. (मधुमत्तमम्) = यह सोम मन को पवित्र और राग-द्वेषादि से रहित करके जीवन को बड़े माधुर्यवाला बना देता है ।

इस सोम को शरीर में इसलिए उत्पन्न करो कि ४. इन्द्राय यह आत्मा की शक्ति के विकास के लिए होता है। जीवात्मा को इन्द्रियों पर प्रभुत्ववाला बनाता है और इस प्रकार वह सचमुच ‘इन्द्र' बनता है ५. सोम को इसलिए भी उत्पन्न करो कि वज्रिणे = यह हमारे शरीर को वज्र-तुल्य बनाए। सोम शरीर को नीरोग व दृढ़ बनाता है।
Essence
सोम स्वर्ग का अमृत है— सुरक्षित होकर यह हमारे जीवन को उत्तम बनाता है।
Subject
स्वर्ग का अमृत