Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1215

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣡ त्वा꣢ श꣣तं꣢ च꣣ न꣢꣫ ह्रुतो꣣ रा꣢धो꣣ दि꣡त्स꣢न्त꣣मा꣡ मि꣢नन् । य꣡त्पु꣢ना꣣नो꣡ म꣢ख꣣स्य꣡से꣢ ॥१२१५॥

न । त्वा꣣ । शत꣢म् । च꣣ । न꣢ । ह्रु꣡तः꣢꣯ । रा꣡धः꣢꣯ । दि꣡त्स꣢꣯न्तम् । आ । मि꣣नन् । य꣢त् । पु꣣नानः꣢ । म꣣खस्य꣡से꣢ ॥१२१५॥

Mantra without Swara
न त्वा शतं च न ह्रुतो राधो दित्सन्तमा मिनन् । यत्पुनानो मखस्यसे ॥

न । त्वा । शतम् । च । न । ह्रुतः । राधः । दित्सन्तम् । आ । मिनन् । यत् । पुनानः । मखस्यसे ॥१२१५॥

Samveda - Mantra Number : 1215
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु 'अमहीयु' से कहते हैं कि १. (यत्) = जब (पुनान:) = अपने जीवन को पवित्र बनाता हुआ २. (मखस्यसे) = तू यज्ञों को करना चाहता है तब ३. (राधः) = धनों को (दित्सन्तम्) = देने की इच्छावाले (त्वा) = तुझे (शतम्) = सैकड़ों (ह्रुतः) = कुटिल भावनाएँ (चन) = भी न (आमिनन्) = हिंसित नहीं करतीं। = हमारे जीवन में सदा शतश: कुटिल भावनाएँ हमारे मनों पर आक्रमण कर रही हैं। इनसे बचने का उपाय यही है कि १. हम सदा अपने को पवित्र बनाने का ध्यान करें २. यज्ञ करने की कामनावाले हों तथा ३. सदा देने की इच्छावाले हों । पवित्रता, यज्ञ व दान के विचार ही हमारी अशुभों से रक्षा करते हैं ।
Essence
हम पवित्र बनें, यज्ञ की कामनावाले हों, अपने में दान की भावना को जगाएँ । 
Subject
पवित्रता, यज्ञ व दान