Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1200

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यः꣡ सोमः꣢꣯ क꣣ल꣢शे꣣ष्वा꣢ अ꣣न्तः꣢ प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣡हि꣢तः । त꣢꣫मिन्दुः꣣ प꣡रि꣢ षस्वजे ॥१२००॥

यः । सो꣡मः꣢꣯ । क꣣ल꣡शे꣢षु । आ । अ꣣न्त꣡रिति꣢ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । आ꣡हि꣢꣯तः । आ । हि꣣तः । त꣢म् । इ꣡न्दुः꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ । स꣣स्वजे ॥१२००॥

Mantra without Swara
यः सोमः कलशेष्वा अन्तः पवित्र आहितः । तमिन्दुः परि षस्वजे ॥

यः । सोमः । कलशेषु । आ । अन्तरिति । पवित्रे । आहितः । आ । हितः । तम् । इन्दुः । परि । सस्वजे ॥१२००॥

Samveda - Mantra Number : 1200
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(यः) = जो भी व्यक्ति १. (सोम:) = सोमपान करके सोम [शक्ति ] का पुञ्ज बनता है, परन्तु साथ ही अत्यन्त सौम्य स्वभाववाला होता है। २. (कलशेषु) = [कला: शेरते एषु] प्राणादि सोलह कलाओं के आधारभूत पञ्चकोषों के (अन्तः) = अन्दर (आपवित्र:) = समन्तात् पवित्र होकर (आहित:)-स्थापित होता है। जो अपने शरीर को निर्बलता, प्राणमयकोश को रोग, मनोमयकोश को द्वेषादि, विज्ञानमयकोश को कुण्ठता तथा आनन्दमयकोश को असहिष्णुता आदि मलों से मलिन नहीं होने देता और इस प्रकार सर्वथा पवित्र होकर इन कलशों- कोशों में निवास करता है, (तम्) = उसको ही (इन्द्रः) = वे सर्वशक्तिमान् सर्वैश्वर्य सम्पन्न प्रभु (परिषस्वजे) = आलिंगन करते हैं ।
Essence
हम सौम्य व पवित्र बनकर प्रभु के आलिंगन के पात्र बनें ।
Subject
प्रभु का आलिंगन