Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 120

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- देवजामय इन्द्रमातर ऋषिकाः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡मि꣢न्द्र꣣ ब꣢ला꣣द꣢धि꣣ स꣡ह꣢सो जा꣣त꣡ ओज꣢꣯सः । त्वꣳ सन्वृ꣢꣯ष꣣न्वृ꣡षेद꣢꣯सि ॥१२०॥

त्व꣢म् । इ꣣न्द्र । ब꣡ला꣢꣯त् । अ꣡धि꣢꣯ । स꣡ह꣢꣯सः । जा꣣तः꣢ । ओ꣡ज꣢꣯सः । त्व꣢म् । सन् । वृ꣣षन् । वृ꣡षा꣢꣯ । इत् । अ꣣सि ॥१२०॥

Mantra without Swara
त्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजसः । त्वꣳ सन्वृषन्वृषेदसि ॥

त्वम् । इन्द्र । बलात् । अधि । सहसः । जातः । ओजसः । त्वम् । सन् । वृषन् । वृषा । इत् । असि ॥१२०॥

Samveda - Mantra Number : 120
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र की ऋषिका 'देवजामयः इन्द्रमातरः' हैं। ये दिव्य गुणों को जन्म देनेवाली हैं और इन्द्र का निर्माण करती हैं। यदि माता शैशव में ही उसे आत्मा की सम्पत्ति कमाने का उपदेश करेगी तो वह जीव सचमुच 'इन्द्र' बनेगा, अन्यथा इन्द्रियों को सबल बनाने में ही लगा रहेगा। माताओं को बालकों में आरम्भ से ही दिव्य गुणों को पैदा करने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए, अतः ये देव- जामियाँ जात बालक से कहतीं हैं कि (इन्द्र) = इन्द्र! (त्वम्) =तू (बलात् अधिजातः असि)= मानस बल से उत्पन्न हुआ है, तू (सहस:) = सहन-शक्ति से उत्पन्न हुआ है, (ओजसः) = ओजस् से उत्पन्न हुआ है। तुझे मानस अपने में बल व ओज का सम्पादन करना है और सहन शक्ति का पुञ्ज बनना है। मानस बल का सम्पादन करके (त्वम्) = तू (सन्) = एक विशेष सत्तावाला बनना । तू संसार में non-entity=सत्ताशून्य निर्बल-सा प्राणी न बनना। सहन शक्ति का पुञ्ज होकर तू (वृषन्) = सुखों की वर्षा करनेवाला हो। इस प्रकार ओजस्वी बनकर तू इत् सचमुच (वृषा) = बलवान् बनना- प्रभावशाली बनना, औरों पर अपने प्रभाव की वर्षा करनेवाला होना। यह बल, सहस् व ओज ही तेरी आत्मिक सम्पत्ति हैं, तू इन्हीं को महत्त्व देना
Essence
माताएँ अपने बालकों में दिव्य गुणों को जन्म देकर उन्हें परमैश्वर्यशाली 'इन्द्र' बनाएँ।
Subject
माता का कर्त्तव्य