Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 12

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
दू꣣तं꣡ वो꣢ वि꣣श्व꣡वे꣢दसꣳ हव्य꣣वा꣢ह꣣म꣡म꣢र्त्यम् । य꣡जि꣢ष्ठमृञ्जसे गि꣣रा꣢ ॥१२॥

दू꣣त꣢म् । वः꣣ । विश्व꣡वे꣢दसम् । वि꣣श्व꣢ । वे꣣दसम् । हव्यवा꣡ह꣢म् । ह꣣व्य । वा꣡ह꣢꣯म् । अ꣡म꣢꣯र्त्यम् । अ । म꣣र्त्यम् । य꣡जि꣢꣯ष्ठम् । ऋ꣣ञ्जसे । गिरा꣢ ॥१२॥

Mantra without Swara
दूतं वो विश्ववेदसꣳ हव्यवाहममर्त्यम् । यजिष्ठमृञ्जसे गिरा ॥

दूतम् । वः । विश्ववेदसम् । विश्व । वेदसम् । हव्यवाहम् । हव्य । वाहम् । अमर्त्यम् । अ । मर्त्यम् । यजिष्ठम् । ऋञ्जसे । गिरा ॥१२॥

Samveda - Mantra Number : 12
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वे प्रभु (वः) = तुम सब भक्तों के (दूतम्) = सन्तापक, सन्ताप की अग्नि में डालकर परीक्षा करनेवाले हैं। वे प्रभु (विश्ववेदसम्)= सम्पूर्ण धनोंवाले हैं। कष्टों की परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर वे विविध ऐश्वर्यों को प्राप्त कराकर दूसरी परीक्षा लेते हैं कि यह सम्पत्तियों के लोभ में कहाँ तक नहीं फँसता? इन दोनों परीक्षाओं में उत्तीर्ण व्यक्ति ही हव्य हैं- प्राजापत्य यज्ञ में अपनी आहुति डालनेवाले हैं। वह प्रभु (हव्यवाहम्)= इन हव्य मनुष्यों को अपने समीप ले-जानेवाले हैं। [वह् प्रापणे = to carry ] और (अमर्त्यम्)= इन अपने सच्चे भक्तों को अमर्त्य करनेवालेजन्म-मरण के चक्र से मुक्त करनेवाले हैं, यजिष्ठम् - अधिक-से-अधिक अपने साथ सङ्गत करनेवाले हैं, अर्थात् अपने समीप प्राप्तिरूप मोक्ष देनेवाले हैं। इस प्रभु को (गिरा)= मैं अपनी वाणी से (ऋञ्जसे)= प्रसाधित आराधित करता हूँ।
अपनी वाणी से सदा उसी का गुणगान करता हूँ और इस गुणगान से स्वयं भी उत्तम गुणों में प्रीतिवाला बनकर इस मन्त्र का ऋषि ‘वामदेव' बनता हूँ।
Essence
मनुष्य आपत्तियों और सम्पत्तियों की परीक्षाओं से उत्तीर्ण होकर ही मोक्ष का अधिकारी बनता है ।
Subject
दो प्रकार की परीक्षा