Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1199

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
दि꣣वो꣡ नाभा꣢꣯ विचक्ष꣣णो꣢ऽव्या꣣ वा꣡रे꣢ महीयते । सो꣢मो꣣ यः꣢ सु꣣क्र꣡तुः꣢ क꣣विः꣢ ॥११९९॥

दि꣣वः꣢ । ना꣡भा꣢꣯ । वि꣣चक्षणः꣢ । वि꣣ । चक्षणः꣢ । अ꣡व्याः꣢꣯ । वा꣡रे꣢꣯ । म꣣हीयते । सो꣡मः꣢꣯ । यः । सु꣣क्र꣡तुः꣢ । सु꣣ । क्र꣡तुः꣢꣯ । क꣣विः꣢ ॥११९९॥

Mantra without Swara
दिवो नाभा विचक्षणोऽव्या वारे महीयते । सोमो यः सुक्रतुः कविः ॥

दिवः । नाभा । विचक्षणः । वि । चक्षणः । अव्याः । वारे । महीयते । सोमः । यः । सुक्रतुः । सु । क्रतुः । कविः ॥११९९॥

Samveda - Mantra Number : 1199
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वह व्यक्ति (अव्या) = [अव्= रक्षण] वासनाओं से अपने रक्षण के द्वारा (वारे) = वरणीय प्रभु में (महीयते) = महिमा का अनुभव करता है। जब हम सब वासनाओं से अपने को सुरक्षित कर लेते हैं तब प्रभु में स्थित होकर अपनी महिमा को देख पाते हैं—आत्मोत्कर्ष का साक्षात्कार करते हैं। ऐसा कर वही पाता है (यः) = जो -

१. (दिवः नाभा) = [नाभि=centre, chief point वा home] ज्ञान के केन्द्र में विचरण करता है। जिसकी क्रियाओं का मुख्य ध्येय ज्ञान की प्राप्ति होता है । जो ज्ञान को ही अपना घर बनाता है । २. (यः विचक्षणः) = ज्ञान में विचरण करने के कारण जो वस्तुतत्त्व को विशेषरूप से देखनेवाला होता है। ३. (सोमः) = वस्तुतत्त्व को देखने के कारण ही इस अनन्त संसार में अपनी शक्ति व ज्ञान की सीमाओं को देखता हुआ जो सदा सौम्य स्वभाववाला होता है – कभी गर्व नहीं करता । ४. (सुक्रतुः) = सदा उत्तम सङ्कल्पों व कर्मोंवाला होता है । ५. (कविः) = क्रान्तदर्शी बनता है [कौति] तथा ज्ञान का प्रचार करता है ।
Essence
हम ज्ञान के केन्द्र में ही विचरण करें और ज्ञान का ही प्रसार करें ।
Subject
महिमा की अनुभूति