Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1197

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ विप्रा꣢꣯ अनूषत꣣ गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ । इ꣢न्द्र꣣ꣳ सो꣡म꣢स्य पी꣣त꣡ये꣢ ॥११९७॥

अ꣣भि꣢ । वि꣡प्राः꣢꣯ । वि । प्राः꣣ । अनूषत । गा꣡वः꣢꣯ । व꣣त्स꣢म् । न । धे꣣न꣡वः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । सो꣡म꣢꣯स्य । पी꣣त꣡ये꣢ ॥११९७॥

Mantra without Swara
अभि विप्रा अनूषत गावो वत्सं न धेनवः । इन्द्रꣳ सोमस्य पीतये ॥

अभि । विप्राः । वि । प्राः । अनूषत । गावः । वत्सम् । न । धेनवः । इन्द्रम् । सोमस्य । पीतये ॥११९७॥

Samveda - Mantra Number : 1197
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(विप्राः) = अपना विशेषरूप से पूरण करने की कामनावाले, अपनी न्यूनताओं को दूर करने की प्रबल इच्छावाले व्यक्ति (इन्द्रम्) = सब ऐश्वर्यों को अधिष्ठाता प्रभु का (अभि अनूषत) = दोनों ओर, अर्थात् सोते-जागते, खाते-पीते, उठते-बैठते स्तवन करते हैं। प्रभु से ये ऐसा ही प्रेम करते हैं न-जैसेकि (धेनवः) = दुधारू गौएँ (वत्सम्) = बछड़े से प्रेम करती हैं। गौवों का बछड़े के प्रति प्रेम अनुपम है, विप्र लोगों का प्रभु के प्रति ऐसा ही प्रेम होता है तभी तो उसकी भक्ति में वे तन्मय हो जाते हैं और रसमय वाणी से उसका स्तवन करते हैं। ऐसा ये सोमस्य पीतये-सोम के पान के लिए करते हैं । शरीर के अन्दर रसादि क्रम से उत्पन्न सोम की रक्षा – उसका शरीर में ही पान करना प्रभुस्तवन के बिना सम्भव नहीं । वासनामय जगत् सोमपान के लिए अत्यन्त दूषित है— इस सोम का पान तो वासना- विनाश से ही सम्भव है । वासना- विनाश के लिए प्रभु-स्मरण अचूक औषध है ।
Essence
प्रभु-स्तवन मेरी वासनाओं को विनष्ट करके मुझे सोमपान के योग्य बनाता है। इस सोमपान से मेरा शरीर नीरोग बनता है । मन निर्मल होता है और बुद्धि तीव्र होती है । इस प्रकार मेरा पूरण होता है और मैं 'विप्र' बनता हूँ ।
Subject
इन्द्र-स्तवन