Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1194

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
जु꣢ष्ट꣣ इ꣡न्द्रा꣢य मत्स꣣रः꣡ पव꣢꣯मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् । वि꣢श्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षो꣢ जहि ॥११९४॥

जु꣡ष्टः꣢꣯ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । म꣣त्सरः꣡ । प꣡व꣢꣯मानः । क꣡निक्रदत् । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ । ज꣣हि ॥११९४॥

Mantra without Swara
जुष्ट इन्द्राय मत्सरः पवमानः कनिक्रदत् । विश्वा अप द्विषो जहि ॥

जुष्टः । इन्द्राय । मत्सरः । पवमानः । कनिक्रदत् । विश्वाः । अप । द्विषः । जहि ॥११९४॥

Samveda - Mantra Number : 1194
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
आचार्य के उपदेश से (इन्द्राय जुष्टः) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के प्रति [जुष्=प्रीतिसेवनयोः] प्रीतिवाला तथा उसकी उपासना करनेवाला (मत्सरः) = एक अद्भुत आनन्दोल्लास में आगे और आगे बढ़नेवाला [प्रभुभक्त को एक अद्भुत आनन्द का अनुभव होता ही है । वह उस आनन्द में मस्तसा हो जाता है]। (पवमानः) = अपने जीवन को पवित्र करने के स्वभाववाला (कनिक्रदत्) = बारम्बार पुकारता है कि—हे प्रभो! (विश्वाः)= मेरे न चाहते हुए भी मेरे अन्दर प्रविष्ट हो जानेवाली (द्विषः) = इन द्वेष की भावनाओं को [द्वेषणं-द्विट्] (अपजहि) = सुदूर नष्ट कर दीजिए। आपके स्मरण से मेरा हृदय प्रीति से भर जाए, वहाँ द्वेष का नामोनिशान भी न रहे ।
Essence
मैं प्रभु-भक्त बनूँ, पवित्र बनूँ, प्रेम से पगा मेरा हृदय हो ।
Subject
पवमान की प्रार्थना