Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1186

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वृ꣣ष्टिं꣢ दि꣣वः꣡ परि꣢꣯ स्रव द्यु꣣म्नं꣡ पृ꣢थि꣣व्या꣡ अधि꣢꣯ । स꣡हो꣢ नः सोम पृ꣣त्सु꣡ धाः꣢ ॥११८६॥

वृ꣣ष्टि꣢म् । दि꣣वः꣡ । प꣡रि꣢꣯ । स्र꣣व । द्युम्न꣢म् । पृ꣣थिव्याः꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । स꣡हः꣢꣯ । नः꣣ । सोम । पुत्सु꣢ । धाः꣢ ॥११८६॥

Mantra without Swara
वृष्टिं दिवः परि स्रव द्युम्नं पृथिव्या अधि । सहो नः सोम पृत्सु धाः ॥

वृष्टिम् । दिवः । परि । स्रव । द्युम्नम् । पृथिव्याः । अधि । सहः । नः । सोम । पुत्सु । धाः ॥११८६॥

Samveda - Mantra Number : 1186
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
सोमलता की जब अग्निहोत्र में आहुतियाँ दी जाती हैं तब कहते हैं कि हे प्रभो ! तू १. (दिवः) = अन्तरिक्ष से (वृष्टिं परिस्रव) = वर्षा करनेवाला हो २. उस वर्षा के परिणामस्वरूप (पृथिव्याः अधिद्युम्नं परिस्रव) = इस पृथिवी में अधिक अन्न का जन्म देनेवाला बन । ३. और इस अन्न के द्वारा (नः) = हममें (पृत्सु) = रोगादि से संग्रामों में (सहः) = शक्ति को (धाः) = धारण कर।

एवं, सोमाहुति वृष्टि का कारण बनती है, अन्न को उत्पन्न करती है, और हमें शक्ति देती है कि हम रोगादि से संग्राम में सदा विजयी बनें ।

सोम का अर्थ प्रभु करें तो मन्त्रार्थ इस प्रकार होगा ।

१. हे (सोम) = प्रभो ! धर्ममेघ समाधि में (दिवः) = मस्तिष्करूप द्युलोक से वृष्टिम् आनन्द की वृष्टि को (परिस्रव) = कीजिए । २. (पृथिव्याः अधि) = इस शरीररूप पृथिवी में (द्युम्नम्) = ज्योति व शक्ति को उत्पन्न कीजिए । ३. (पृत्सु) = वासनाओं के साथ संग्रामों में (नः) = हमारे अन्दर (सह:) = इन शत्रुओं के पराभव के बल को (धाः) = धारण कीजिए । 
Essence
हम यज्ञों में सोमलता की आहुति दें। इस जीवन-यज्ञ में प्रभु का पूजन करनेवाले बनें ।
Subject
सोम-लता