Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1185

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नृ꣣च꣡क्ष꣢सं त्वा व꣣य꣡मिन्द्र꣢꣯पीतꣳ स्व꣣र्वि꣡द꣢म् । भ꣣क्षीम꣡हि꣢ प्र꣣जा꣡मिष꣢꣯म् ॥११८५॥

नृच꣡क्ष꣢꣯सम् । नृ꣣ । च꣡क्ष꣢꣯सम् । त्वा꣣ । वय꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯पीतम् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । पी꣣तम् । स्वर्वि꣡द꣢म् । स्वः꣣ । वि꣡द꣢꣯म् । भ꣣क्षीम꣡हि꣢ । प्र꣣जा꣢म् । प्र꣣ । जा꣢म् । इ꣡ष꣢꣯म् ॥११८५॥

Mantra without Swara
नृचक्षसं त्वा वयमिन्द्रपीतꣳ स्वर्विदम् । भक्षीमहि प्रजामिषम् ॥

नृचक्षसम् । नृ । चक्षसम् । त्वा । वयम् । इन्द्रपीतम् । इन्द्र । पीतम् । स्वर्विदम् । स्वः । विदम् । भक्षीमहि । प्रजाम् । प्र । जाम् । इषम् ॥११८५॥

Samveda - Mantra Number : 1185
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे सोम! (वयम्) = हम (त्वा) = तुझे भक्षीमहि अपने अन्दर ग्रहण करते हैं। किस तुझे – १. (नृचक्षसम्) = सब मनुष्यों का ध्यान करनेवाले को [चक्ष्=look after] । शरीर में उत्पन्न सोम [शक्ति] मनुष्य को रोगादि से बचाता है और इस सोम-उत्पादन की व्यवस्था करनेवाले प्रभु तो हमारा पालन करनेवाले हैं ही । २. (इन्द्रपीतम्) = इस सोम का पान जितेन्द्रिय पुरुष के द्वारा होता है— उस प्रभु का भी पान – अपने अन्दर ग्रहण जितेन्द्रिय पुरुष ही कर पाता है । ३. (स्वर्विदम्) = यह पीया हुआ सोम उस (स्वः) = स्वयं देदीप्यमान ज्योति को प्राप्त करानेवाला है और प्राप्त हुई हुई वह ज्योति (स्व:) = सब सुखों को देनेवाली है। ४. (प्रजाम्) = प्रकृष्ट विकास का यह कारण होता है । इस सोम की रक्षा ही सब उन्नतियों का मूल है और प्रभु - चिन्तन हमारे हृदय को विशाल बनानेवाला है । ५. (इषम्) = यह सोम हमारे जीवन को गतिशील बनाता है [इष् गतौ] और वह हृदयस्थ सोम [प्रभु] हमें उत्तम प्रेरणा देते हैं [इष् प्रेरणे] । इस प्रकार इन सोमों के द्वारा हम 'असित’, ‘काश्यप’ व 'देवल' = स्वतन्त्र, ज्ञानी व देव बन पाते हैं ।
Essence
हम सोम का पान करें तथा इस सोमपान से उस सोमरूप प्रभु का दर्शन करेंगी।
Subject
इस सोम को और उस सोम को