Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1183

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣣नानः꣢ क꣣ल꣢शे꣣ष्वा꣡ वस्त्रा꣢꣯ण्यरु꣣षो꣡ हरिः꣢꣯ । प꣢रि꣣ ग꣡व्या꣢न्यव्यत ॥११८३॥

पुनानः꣢ । क꣣ल꣡शे꣢षु । आ । व꣡स्त्रा꣢꣯णि । अ꣣रुषः꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ । ग꣡व्या꣢꣯नि । अ꣣व्यत ॥११८३॥

Mantra without Swara
पुनानः कलशेष्वा वस्त्राण्यरुषो हरिः । परि गव्यान्यव्यत ॥

पुनानः । कलशेषु । आ । वस्त्राणि । अरुषः । हरिः । परि । गव्यानि । अव्यत ॥११८३॥

Samveda - Mantra Number : 1183
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मानव शरीर में सोलह कलाएँ हैं, अतः यह शरीर 'कलश' कहलाता है। सोम-शक्ति इस शरीर-कलश को बड़ा सुन्दर बनाए रखती है । मन्त्र में कहते हैं – (कलशेषु) = इन शरीरों में (वस्त्राणि) = स्थूल, सूक्ष्म व कारणशरीररूप वस्त्रों को (आपुनानः) = सर्वथा पवित्र करते हुए (अरुषः) = रोगों व अशुभ वृत्तियों से इन्हें नष्ट न होने देनेवाला (हरिः) = सब मलों व रोगों का हरण करनेवाला यह सोम (गव्यानि) = इन्द्रियों की शक्तियों को (परि अव्यत) = सुरक्षित करता है । अथवा (गव्यानि) = वेदवाणियों को (परि अव्यत) = सम्यक् ज्ञात कराता है। सोम से शक्ति की रक्षा भी होती है और ज्ञान की वृद्धि भी ।
 
Essence
सोम हमारी है शक्तियों को बढ़ाता ।
Subject
शक्ति व ज्ञान की वृद्धि