Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1179

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣣नाना꣡स꣢श्चमू꣣ष꣢दो꣣ ग꣡च्छ꣢न्तो वा꣣यु꣢म꣣श्वि꣡ना꣢ । ते꣡ नो꣢ धत्त सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥११७९॥

पु꣣नाना꣡सः꣢ । च꣣मूष꣡दः꣢ । च꣣मू । स꣡दः꣢꣯ । ग꣡च्छ꣢꣯न्तः । वा꣣यु꣢म् । अ꣣श्वि꣡ना꣢ । ते । नः꣣ । धत्त । सुवी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् ॥११७९॥

Mantra without Swara
पुनानासश्चमूषदो गच्छन्तो वायुमश्विना । ते नो धत्त सुवीर्यम् ॥

पुनानासः । चमूषदः । चमू । सदः । गच्छन्तः । वायुम् । अश्विना । ते । नः । धत्त । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् ॥११७९॥

Samveda - Mantra Number : 1179
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे सोमो! १. (पुनानासः) = हमारे जीवनों को पवित्र करते हुए । इन सोमकणों से जहाँ शरीर नीरोग होता है, वहाँ साथ ही मनोवृत्ति भी सुन्दर बनती है । एवं, ये सोम हमें अधिकाधिक पवित्र बनाते चलते हैं।

२. (चमूषदः) = द्यावापृथिवी में स्थिर होनेवाले, अर्थात् हम प्रयत्न करके इन सोमकणों को शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न करें । मस्तिष्क तक आकर ये हमारी ज्ञानाग्नि को दीप्त करनेवाले हों ।

३. (अश्विना) = प्राणापानों के द्वारा (वायुम्) = सारे ब्रह्माण्ड को गति देनेवाले [वा गतौ] प्रभु की ओर (गच्छन्तः) = जाते हुए । प्राणापान की साधना से ये सोमकण शरीर में सुरक्षित होते है। इनकी ऊर्ध्वगति होती है। ये हमारी बुद्धि को सूक्ष्म बनाते है और हम प्रभुदर्शन कर पाते हैं।

४. हे सोमो! (ते) = वे आप (नः) = हममें (सुवीर्यम्) = उत्तम शक्ति को (धत्त) = धारण कीजिए ।
Essence
शरीर में प्राणापान की साधना से सोम की ऊर्ध्वगति होती है। ये सोम १. हमें पवित्र बनाते हैं, २. प्रभु की ओर ले जाते हैं, ३. शक्ति प्राप्त कराते हैं ।
Subject
पवित्रता, प्रभु-प्राप्ति व शक्ति-लाभ