Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1173

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- अत्रिर्भौमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
य꣡न्मन्य꣢꣯से꣣ व꣡रे꣢ण्य꣣मि꣡न्द्र꣢ द्यु꣣क्षं꣡ तदा भ꣢꣯र । वि꣣द्या꣢म꣣ त꣡स्य꣢ ते व꣣य꣡मकू꣢꣯पारस्य दा꣣व꣡नः꣢ ॥११७३॥

य꣢त् । म꣡न्य꣢꣯से । व꣡रे꣢꣯ण्यम् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । द्यु꣣क्ष꣢म् । द्यु꣣ । क्ष꣢म् । तत् । आ । भ꣣र । विद्या꣡म꣢ । त꣡स्य꣢꣯ । ते꣣ । वय꣢म् । अ꣡कू꣢꣯पारस्य । दावनः ॥११७३॥

Mantra without Swara
यन्मन्यसे वरेण्यमिन्द्र द्युक्षं तदा भर । विद्याम तस्य ते वयमकूपारस्य दावनः ॥

यत् । मन्यसे । वरेण्यम् । इन्द्र । द्युक्षम् । द्यु । क्षम् । तत् । आ । भर । विद्याम । तस्य । ते । वयम् । अकूपारस्य । दावनः ॥११७३॥

Samveda - Mantra Number : 1173
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो! आप (यत्) = जो भी (द्युक्षम्) = दिव्य ज्ञान की अविरोधी (वरेण्यम्) = वरणीय—चाहने योग्य वस्तु (मन्यसे) = समझते हैं (तत्) = उस दिव्य वरणीय वस्तु को (आभर) = हमें प्राप्त कराइए । वस्तुतः मनुष्य के लिए यह निश्चय करना कठिन हो जाता है कि उसे किस वस्तु की प्रार्थना करनी चाहिए और किसकी नहीं, अत: प्रार्थना का यही स्वरूप सर्वोत्तम है कि हे प्रभो ! हमें वही दिव्य, वरणीय वस्तु प्राप्त कराइए जो आपकी दृष्टि में हमारे लिए हितकर है ।

(वयम्) = कर्मतन्तु का विस्तार करनेवाले, अर्थात् पुरुषार्थ में तत्पर हम (ते) = आपके (तस्य) = उस (अकूपारस्य) = [अकुत्सित परणस्य] अनिन्दित पालन व पोषण करनेवाले (दावन:) = दान के (विद्याम) = प्राप्त करनेवाले हों [विद् लाभे] । बिना पुरुषार्थ के प्रार्थना (निष्प्रयोजन) = है, अत: हम पुरुषार्थी हों और आपकी कृपा प्राप्त करने के अधिकारी हों। आपके दान अनन्त हैं, आपके दान दिव्य हैं, वस्तुतः वे ही हमारे लिए वरणीय हैं।
Essence
हे प्रभो! हम आपके दिव्य, वरेण्य दान को प्राप्त करने के पात्र हों।
Subject
वरेण्य दिव्य दान