Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1171

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- पुर उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वा꣡ꣳ शु꣢ष्मिन्पुरुहूत वाज꣣य꣢न्त꣣मु꣡प꣢ ब्रुवे सहस्कृत । स꣡ नो꣢ रास्व सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥११७१॥

त्वा꣢म् । शु꣣ष्मिन् । पुरुहूत । पुरु । हूत । वाजय꣡न्त꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । ब्रु꣣वे । सहस्कृत । सहः । कृत । सः꣢ । नः꣣ । रास्व । सुवी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् ॥११७१॥

Mantra without Swara
त्वाꣳ शुष्मिन्पुरुहूत वाजयन्तमुप ब्रुवे सहस्कृत । स नो रास्व सुवीर्यम् ॥

त्वाम् । शुष्मिन् । पुरुहूत । पुरु । हूत । वाजयन्तम् । उप । ब्रुवे । सहस्कृत । सहः । कृत । सः । नः । रास्व । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् ॥११७१॥

Samveda - Mantra Number : 1171
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (शुष्मिन्) = शत्रुओं का शोषण करनेवाले बल से सम्पन्न प्रभो ! (पुरुहूत) = हे सबसे पुकारे जानेवाले प्रभो ! जिन आपका आह्वान हमारा पालन व पूरण करनेवाला है, (सहस्कृत) = सहस् के द्वारा उत्पादित, अर्थात् ध्यान किये गये प्रभो ! वस्तुतः प्रभु का दर्शन तो उसे ही होता है जो सहनशक्ति के बल से सम्पन्न होता है। यही सहस् शक्ति की चरम सीमा है– [सहोऽसि सहो मयि धेहि] (वाजयन्तम्) = शक्ति व धन प्राप्त कराते हुए (त्वाम्) = आपकी (उपब्रुवे) = विनयभरी प्रार्थना करता हूँ । (सः) = वे आप (नः) = हमें (सुवीर्यम्) = उत्तम शक्ति (रास्व) = प्रदान कीजिए। आप मुझे उत्तम शक्ति दीजिए, मैं ईर्ष्या-द्वेष आदि शत्रुओं का शोषण करता हुआ जहाँ सबके साथ मिलकर चलनेवाला

‘नृमेध' [नृ=मनुष्य मेध-संगम] बनूँ, वहाँ अङ्ग-प्रत्यङ्ग में शक्ति-सम्पन्न होकर 'आङ्गिरस' होऊँ । अपने अन्दर अद्भुत ‘सहस्’=बल उत्पन्न करके आपका दर्शन कर पाऊँ । मुझे यह शक्ति आपको ही प्राप्त करानी है। मेरे ‘वाजयन्' आप ही हैं । हे पुरुहूत ! आपकी पुकार ही मेरा पालन करनेवाली है, आपको छोड़ और किसके द्वार पर जाऊँ ?
Essence
हे प्रभो ! आपकी कृपा से मैं सुवीर्य प्राप्त करूँ, ‘सहस्'=-बल-सम्पन्न होकर आपके दर्शन करूँ ।
 
Subject
सहस्, सम्पन्नता व प्रभु-दर्शन