Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1167

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣣रुत्रा꣢꣫ हि स꣣दृङ्ङ꣢꣫सि꣣ दि꣢शो꣣ वि꣢श्वा꣣ अ꣡नु꣢ प्र꣣भुः꣢ । स꣣म꣡त्सु꣢ त्वा हवामहे ॥११६७॥

पु꣣रुत्रा꣢ । हि । स꣣दृ꣢ङ् । स꣣ । दृ꣢ङ् । अ꣡सि꣢꣯ । दि꣡शः꣢꣯ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣡नु꣢꣯ । प्र꣣भुः꣢ । प्र꣣ । भुः । स꣣म꣡त्सु꣢ । स꣣ । म꣡त्सु꣢꣯ । त्वा꣣ । ह꣣वा꣡म꣢हे ॥११६७॥

Mantra without Swara
पुरुत्रा हि सदृङ्ङसि दिशो विश्वा अनु प्रभुः । समत्सु त्वा हवामहे ॥

पुरुत्रा । हि । सदृङ् । स । दृङ् । असि । दिशः । विश्वाः । अनु । प्रभुः । प्र । भुः । समत्सु । स । मत्सु । त्वा । हवामहे ॥११६७॥

Samveda - Mantra Number : 1167
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘वदतीति वत्सः' इस व्युत्पत्ति से वेदमन्त्रों से प्रभु का स्तवन करनेवाला कहता है कि — १ . (हि) = निश्चय से (पुरुत्रा) = आप पालन और पूरण करनेवाले [पुरु=पृणाति] तथा त्राण [रक्षा] करनेवाले हैं, २. (सदृङ् असि) = आप सभी को समान दृष्टि से देखनेवाले हैं। किसी भी प्रकार के पक्षपात से युक्त न होकर आप सभी का समानरूप से पालन करनेवाले हैं। कार्यानुसार सबके लिए उचित व्यवस्था कर रहें हैं। ३. (विश्वा: दिश: अनु) = सम्पूर्ण दिशाओं में (प्रभुः) = आप ही शासन करनेवाले हैं। सर्वत्र आपका ही साम्राज्य है । ४. (समत्सु) = [समक्षे वा अत्तेः–नि० ९.१७] मिलकर भोजनों के समय में [सम्मदो वा मदतेः – नि० ९.१७] अथवा सम्मिलित हर्ष के अवसरों पर (त्वा) = आपको (हवामहे) = पुकारते हैं, आपका स्मरण करते हैं। सम्मिलित भोजनों व सम्मिलित गानादि गोष्ठियों के अवसरों पर प्रभु-स्मरण इसलिए आवश्यक है कि हम उन कर्मों में मर्यादा के अन्दर रहें, कहीं सीमा का उल्लंघन न कर जाएँ।
Essence
भोजनों में, गानों में, हर्ष के सब अवसरों पर प्रभु-स्मरण करें, जिससे मर्यादोल्लंघन न हो । हर्ष नशे में परिवर्तित न होकर उसकी अपनी पवित्रता बनी रहे ।
Subject
वत्स का प्रभु-स्मरण, हर्ष की पवित्रता