Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1162

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र꣡ सो꣢म या꣣ही꣡न्द्र꣢स्य कु꣣क्षा꣡ नृभि꣢꣯र्येमा꣣नो꣡ अद्रि꣢꣯भिः सु꣣तः꣢ ॥११६२॥

प्र । सो꣣म । याहि । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । कु꣣क्षा꣢ । नृ꣡भिः꣢꣯ । ये꣣मानः꣢ । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । सुतः꣢ ॥११६२॥

Mantra without Swara
प्र सोम याहीन्द्रस्य कुक्षा नृभिर्येमानो अद्रिभिः सुतः ॥

प्र । सोम । याहि । इन्द्रस्य । कुक्षा । नृभिः । येमानः । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । सुतः ॥११६२॥

Samveda - Mantra Number : 1162
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हमारे जीवनों में माता-पिता व परिवार के अन्य बड़े व्यक्ति मुख्यरूप से हमारा नेतृत्व करनेवाले होते हैं। सर्वप्रथम इनके जीवनों का ही हमपर प्रभाव पड़ता है। इन (नृभिः) = नेतृत्व देनेवालों से (येमानः) = संयत जीवनवाले बनाये जाते हुए तथा (अद्रिभिः) = गुरुओं से (सुतः) = जन्म दिया हुआ (सोम) = हे शान्त-स्वभाव आत्मन् ! तू (इन्द्रस्य कुक्षा) = उस प्रभु के कोख में (प्र याहि) = प्रकर्षेण प्राप्त हो । आचार्य ब्रह्मचारी का उपनयन करता हुआ उसे अपने गर्भ में धारण करता है और ज्ञान से परिपक्व करके कालान्तर में उसे द्वितीय जन्म देता है। प्रथम जन्म माता-पिता ने दिया था और माता ने गर्भस्थ बालक को अपने उचित आहार-विहार से शान्त-दान्त बनाने का प्रयत्न किया । अब आचार्य ने उसे ज्ञान से परिपक्व बनाया है। इस प्रकार इन दो जन्मों को प्राप्त करके यह द्विज बना और द्विज बनकर प्रभु की गोद में पहुँचने का अधिकारी हुआ । इसका प्रथम निवास स्थान वा आधार माता-पिता' थे- दूसरे आधार 'आचार्य' थे और अब यह प्रभुरूप तृतीय धाम में विचरनेवाला बना है ।
Essence
हम प्रथम धाम में संयम और द्वितीय धाम में ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करके तृतीय धाम में आनन्द व शान्ति का लाभ करें ।
Subject
परमात्मा की कुक्षि में, तृतीय धाम में