Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1160

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र꣢ वा꣣꣬ज्य꣢꣯क्षाः स꣣ह꣡स्र꣢धारस्ति꣣रः꣢ प꣣वि꣢त्रं꣣ वि꣢꣫ वार꣣म꣡व्य꣢म् ॥११६०॥

प्र꣢ । वा꣣जी꣢ । अ꣣क्षारि꣡ति꣢ । स꣣ह꣡स्र꣢धारः । स꣣ह꣡स्र꣢ । धा꣣रः । तिरः꣢ । प꣣वि꣡त्र꣢म् । वि । वा꣡र꣢꣯म् । अ꣡व्य꣢꣯म् ॥११६०॥

Mantra without Swara
प्र वाज्यक्षाः सहस्रधारस्तिरः पवित्रं वि वारमव्यम् ॥

प्र । वाजी । अक्षारिति । सहस्रधारः । सहस्र । धारः । तिरः । पवित्रम् । वि । वारम् । अव्यम् ॥११६०॥

Samveda - Mantra Number : 1160
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
[क] (वाजी) = बलवाला, [ख] (सहस्रधारः) = [स-हस्र, धारा - वाणी] सदा आनन्दमय मधुर वाणीवाला उस प्रभु की ओर (प्र अक्षाः) = [प्रकर्षेण क्षरति धावति] तेजी से बढ़ चलता है, जो प्रभु - १. (तिरः) = उसके ही अन्दर छिपे हुए हैं, २. (पवित्रम्) = उसके जीवन को पवित्र बनानेवाले हैं, ३. (विवारम्) = विशेषरूप में हमारी वासनाओं का निवारण करनेवाले हैं और ४. (अव्यम्) = रक्षण में उत्तम हैं।

इस मन्त्र में प्रभु-प्राप्ति के दो साधनों का उल्लेख है – १. शक्ति और २. मधुर वाणी - इन दो साधनों से हम उस प्रभु को प्राप्त करते हैं जो प्रभु हमारे ही अन्दर अन्तर्हित हैं, पवित्र हैं, वरणीय हैं और रक्षक हैं ।
Essence
हम शक्ति और माधुर्य के मेल से प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनें ।
Footnote
नोट – वारम् के दो अर्थ हैं— [१] निवारण करनेवाले, [२] वरणीय ।