Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1156

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- पुरुहन्मा आङ्गिरसः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ꣡षा꣢ढमु꣣ग्रं꣡ पृत꣢꣯नासु सास꣣हिं꣡ यस्मि꣢꣯न्म꣣ही꣡रु꣢रु꣣ज्र꣡यः꣢ । सं꣢ धे꣣न꣢वो꣣ जा꣡य꣢माने अनोनवु꣣र्द्या꣢वः꣣ क्षा꣡मी꣢रनोनवुः ॥११५६॥

अ꣡षा꣢꣯ढम् । उ꣣ग्र꣢म् । पृ꣡त꣢꣯नासु । सा꣣सहि꣢म् । य꣡स्मि꣢꣯न् । म꣣हीः꣢ । उ꣣रुज्र꣡यः꣢ । उ꣣रु । ज्र꣡यः꣢꣯ । सम् । धे꣣न꣡वः꣢ । जा꣡य꣢꣯माने । अ꣣नोनवुः । द्या꣡वः꣢꣯ । क्षा꣡मीः꣢꣯ । अ꣣नोनवुः ॥११५६॥

Mantra without Swara
अषाढमुग्रं पृतनासु सासहिं यस्मिन्महीरुरुज्रयः । सं धेनवो जायमाने अनोनवुर्द्यावः क्षामीरनोनवुः ॥

अषाढम् । उग्रम् । पृतनासु । सासहिम् । यस्मिन् । महीः । उरुज्रयः । उरु । ज्रयः । सम् । धेनवः । जायमाने । अनोनवुः । द्यावः । क्षामीः । अनोनवुः ॥११५६॥

Samveda - Mantra Number : 1156
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(द्यावः क्षामी:) = द्युलोक व पृथिवीलोक (अनोनवु:) = खूब ही स्तुति करते हैं, अर्थात् क्या देव और क्या मनुष्य सभी उसकी स्तुति करते हैं, जोकि – १. (अषाढम्) = काम-क्रोधादि शत्रुओं से पराभूत नहीं होता, २. (उग्रम्) = काम-क्रोधादि से पराजित न होने के कारण ही जो उदात्त है— उत्कृष्ट स्वाभाववाला है। ३. (पृतनासु) = अध्यात्म-संग्रामों में – हृदयस्थली पर सदा से चल रहे काम-क्रोधादि शत्रुओं से होनेवाले संग्रामों में सासहिम् = शत्रुओं को बुरी तरह से कुचलनेवाला है, ४. (यस्मिन्) = जिसके जीवन में (मही:) = विशाल सेना है, [मही: में विसर्ग लक्ष्मी: की तरह सुनाई पड़ते हैं], अर्थात् इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि उसकी वह सेना है जो शत्रुओं से पराभूत न होकर इसे शत्रुओं का संहार करनेवाली बनाती है।५. (उरुज्रयः) = इस महनीय सेना के कारण ही इसमें [ज्रय overpowering strength] विजयी बल है—जिस बल से यह सब शत्रुओं को पराभूत कर पाता है । ६. (जायमाने) = विकास को प्राप्त होनेवाले इस व्यक्ति में (धेनवः) = वेदवाणियाँ (सम् अनोनवुः) = बड़े उत्तम प्रकार से उस प्रभु का स्तवन करती हैं। इन्हीं छह बातों के कारण क्या देव और क्या मनुष्य सभी इसका स्तवन करते हैं। 
Essence
हम अध्यात्म संग्राम में शत्रुओं का हनन करनेवाले 'पुरुहन्मा' बनें । शत्रुओं को मारकर हम ‘आङ्गिरस' शक्तिशाली हों । 'पुरुहन्मा आङ्गिरस' ही इस मन्त्र का ऋषि है।
Subject
पृथिवीलोक का स्तवन