Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1150

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢ इ꣣द्ध꣢ आ꣣वि꣡वा꣢सति सु꣣म्न꣡मिन्द्र꣢꣯स्य꣣ म꣡र्त्यः꣢ । द्यु꣣म्ना꣡य꣢ सु꣣त꣡रा꣢ अ꣣पः꣢ ॥११५०॥

यः । इ꣣द्धे꣢ । आ꣣वि꣢वा꣢सति । आ꣣ । वि꣡वा꣢꣯सति । सु꣣म्न꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । म꣡र्त्यः꣢꣯ । द्यु꣣म्ना꣡य꣢ । सु꣣त꣡राः꣢ । सु꣣ । त꣡राः꣢꣯ । अ꣣पः꣢ ॥११५०॥

Mantra without Swara
य इद्ध आविवासति सुम्नमिन्द्रस्य मर्त्यः । द्युम्नाय सुतरा अपः ॥

यः । इद्धे । आविवासति । आ । विवासति । सुम्नम् । इन्द्रस्य । मर्त्यः । द्युम्नाय । सुतराः । सु । तराः । अपः ॥११५०॥

Samveda - Mantra Number : 1150
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(यः मर्त्यः) = जो व्यक्ति (इद्धे) = ज्ञान से दीप्त अपने हृदय में (इन्द्रस्य) = परमैश्वर्यशाली परमात्मा के (सुम्नम्) = स्तोत्र को (आविवासति) = करता है, अर्थात् स्तोत्रों के द्वारा प्रभु की पूजा करता है, वह मनुष्य (द्युम्नाय) = ज्ञान के प्रकाश के लिए समर्थ होता है । इस व्यक्ति को प्रकाश प्राप्त होता है और परिणामत: इसके लिए (अप:) = कर्म (सुतरा:) = सुगमता से तैरने योग्य हो जाते हैं। अज्ञानी को ही कर्म बाँधते हैं, क्योंकि उसकी कर्मों में आसक्ति होती है । ज्ञानी के लिए कर्मबन्धन नहीं रहता, क्योंकि यह कर्मफल की इच्छा से ऊपर उठ जाता है । इस प्रकार यह ज्ञानी निष्काम कर्मों के परिणामस्वरूप इस जन्ममरण के चक्र को पार कर लेता है । यह भवसागर में गोते नहीं खाता रहता ।
Essence
हम प्रभु स्तवन करें। प्रभु-स्तवन से हमें प्रकाश प्राप्त हो । प्रकाश हमें निष्काम करके कर्मसन्तरण के योग्य बनाये ।
Subject
भवसागर-सन्तरण