Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 115

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त꣡द्वो꣢ गाय सु꣣ते꣡ सचा꣢꣯ पुरुहू꣣ता꣢य꣣ स꣡त्व꣢ने । शं꣢꣫ यद्गवे꣣ न꣢ शा꣣कि꣡ने꣢ ॥११५॥

त꣢त् । वः꣣ । गाय । सुते꣢ । स꣡चा꣢꣯ । पु꣣रुहूता꣡य꣣ । पु꣣रु । हूता꣡य꣢ । स꣡त्व꣢꣯ने । शम् । यत् । ग꣡वे꣢꣯ । न꣢ । शा꣣कि꣡ने꣢ ॥११५॥

Mantra without Swara
तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने । शं यद्गवे न शाकिने ॥

तत् । वः । गाय । सुते । सचा । पुरुहूताय । पुरु । हूताय । सत्वने । शम् । यत् । गवे । न । शाकिने ॥११५॥

Samveda - Mantra Number : 115
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(तत्) = उस प्रभु का (गाय) = गायन कर जो (पुरुहूताय) = बहुतों से पुकारा जाता है या जिसका आह्वान पालन व पूरण करनेवाला है। कट्टर -से-कट्टर नास्तिक भी कष्ट आ पड़ने पर प्रभु को पुकारता है। प्रभु उसकी पुकार को सुनते हैं, अवश्य उसकी रक्षा करते हैं और उसकी कमी को दूर करते हैं। उस प्रभु का गायन कर जोकि (सत्वने) = शत्रुओं का (सद्) = विशरण-नाश कर देते हैं। प्रभु का गायन करने पर काम-क्रोधादि की वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं। वह प्रभु (यत्) = जोकि (वः) = तुममें से (गवे न शाकिने) = गौ जैसे निर्दोष [innocent, harmles] तथा शक्ति के मद में चूर निर्बलों पर अत्याचारी [शाकी] - दोनों के लिए ही कल्याण करनेवाले हैं। प्रभु सभी का कल्याण करते हैं, चाहे वह भोला-भाला निर्दोष हो अथवा अत्याचारी। यदि वह प्रभु की शरण में आया है तो प्रभु उसका स्वागत ही करते हैं, क्योंकि उसने शुभ मार्ग पर चलने का निश्चय किया है।
प्रभु के गायन के लिए एक नियम ध्यान में रखना चाहिए कि घर के सभी सभ्य (सचा) = मिलकर उस प्रभु का गायन करें। इस सम्मिलित गायन से घर का सारा वातावरण बड़ा सुन्दर बनता है - एक अद्भुत वायुमण्डल।

यह गायन क्यों करें? (सुते) = उत्पादन के निमित्त । प्रभु के स्तवन से मनोवृत्ति इतनी सुन्दर बनती है कि किसी के ध्वंस का हमें ध्यान भी नहीं आता। प्रभु का गायन हममें सर्वबन्धुत्व की भावना को जन्म देता है। उस भावना के जाग्रत् होने पर हम किसी का भी बुरा क्यों चाहेंगे? इस मनोवृत्ति से परस्पर के संघर्ष समाप्त होकर शान्ति का विस्तार होगा। इस शान्ति का उपस्थापन करनेवाला 'शं - यु' इस मन्त्र का ऋषि है। उत्तम ज्ञान होने पर ही यह सब सम्भव है, अतः वह 'बार्हस्पत्य' है, ज्ञानियों का ज्ञानी है ।
Essence
हम सब मिलकर प्रभु का गायन करें, जिससे हममें निर्माण की, नकि ध्वंस की भावना जन्म ले।
Subject
निर्माण, नकि ध्वंस
Footnote
(नोट—इन्द्र का सम्बन्ध ‘सुत’=निर्माण से है, निर्माण के बिना ऐश्वर्य नहीं।)