Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1147

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा या꣢꣯हि धि꣣ये꣢षि꣣तो꣡ विप्र꣢꣯जूतः सु꣣ता꣡व꣢तः । उ꣢प꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि वा꣣घ꣡तः꣢ ॥११४७॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । आ । या꣣हि । धिया꣢ । इ꣣षितः꣢ । वि꣡प्र꣢꣯जूतः । वि꣡प्र꣢꣯ । जू꣣तः । सु꣡ता꣢वतः । उ꣡प꣢꣯ । ब्र꣡ह्मा꣢꣯णि । वा꣣घ꣡तः꣢ ॥११४७॥

Mantra without Swara
इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः । उप ब्रह्माणि वाघतः ॥

इन्द्र । आ । याहि । धिया । इषितः । विप्रजूतः । विप्र । जूतः । सुतावतः । उप । ब्रह्माणि । वाघतः ॥११४७॥

Samveda - Mantra Number : 1147
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु मधुच्छन्दा से कहते हैं – हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव ! (धिया इषितः) = बुद्धि से प्रेरित हुआ-हुआ, (विप्रजूत:) = विशेषरूप से अपना पूरण करने के लिए गतिवाला तू (सुतावत:) = यज्ञशील तथा (वाघतः) = स्तोता पुरुष के (ब्रह्माणि) = स्तोत्रों को (उप आयाहि) = प्राप्त हो ।

प्रभु-प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि हम १. बुद्धि से प्रेरित हों। सब कार्यों को बुद्धिपूर्वक करें । २. हमारा प्रत्येक कार्य अपना विशेषत: पूरण करने के उद्देश्य से हो [वि+प्र]। अपनी न्यूनताओं को दूर करते हुए हम आगे और आगे बढ़ते चलें । ३. हम यज्ञशील स्तोताओं के स्तोत्रों को करनेवाले हों । हमारे स्तोत्र केवल शाब्दिक न हों- हम उनके अनुसार अपने जीवनों को बनाने के लिए भी यत्नशील हों ।
Essence
हमारा प्रत्येक कार्य बुद्धिपूर्वक हो-हम अपना पूरण करें – हमारी स्तुति हमें यज्ञशील बनाए।
Subject
बुद्धिपूर्वक गति