Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1139

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣢ र꣣यि꣡मा सु꣢꣯चे꣣तु꣢न꣣मा꣡ सु꣢क्रतो त꣣नू꣢ष्वा । पा꣢न्त꣣मा꣡ पु꣢रु꣣स्पृ꣡ह꣢म् ॥११३९॥

आ । र꣣यि꣢म् । आ । सु꣣चेतु꣡न꣢म् । सु꣣ । चेतु꣡न꣢म् । आ । सु꣣क्रतो । सु । क्रतो । तनू꣡षु꣢ । आ । पा꣡न्त꣢꣯म् । आ । पु꣣रुस्पृ꣡ह꣢म् । पु꣣रु । स्पृ꣡ह꣢꣯म् ॥११३९॥

Mantra without Swara
आ रयिमा सुचेतुनमा सुक्रतो तनूष्वा । पान्तमा पुरुस्पृहम् ॥

आ । रयिम् । आ । सुचेतुनम् । सु । चेतुनम् । आ । सुक्रतो । सु । क्रतो । तनूषु । आ । पान्तम् । आ । पुरुस्पृहम् । पुरु । स्पृहम् ॥११३९॥

Samveda - Mantra Number : 1139
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (सुक्रतो) = शोभनज्ञान प्रभो ! हम आपके उस सोम का (आवृणीमहे) = वरण करते हैं जो (रयिम्) = वस्तुतः शरीर का धन है । इसके होने से ही शरीर है, इसके अभाव में शरीर भी नहीं है । २. (सुचेतुनम्) = जो हमारे ज्ञान को उत्तम करनेवाला है, बुद्धि को सूक्ष्म बनाता है, (पान्तम्-ह) = हमारी रक्षा करता है, हमारे मनों पर आसुर वृत्तियों का उसी प्रकार आक्रमण नहीं होने देता जैसे शरीर पर रोगों का । ४. (पुरुस्पृहम्) = यह सोम सचमुच महान् स्पृहा को जन्म देकर हमें महान् बनाता है। हे प्रभो! हम इस सोम को (तनूषु) = अपने शरीरों में (आवृणीमहे) = वरते हैं । 'तनू’ का अर्थ सन्तति लें तो अर्थ यह होगा कि इसे हम अपनी सन्तानों के लिए भी वरते हैं ।
Essence
सोम ही वास्तविक शरीर-धन है ।
Subject
रक्षा व उच्च अभिलाषा