Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1138

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣢ म꣣न्द्र꣡मा वरे꣢꣯ण्य꣣मा꣢꣫ विप्र꣣मा꣡ म꣢नी꣣षि꣡ण꣢म् । पा꣢न्त꣣मा꣡ पु꣢रु꣣स्पृ꣡ह꣢म् ॥११३८॥

आ । म꣣न्द्र꣢म् । आ । व꣡रे꣢꣯ण्यम् । आ । वि꣡प्र꣢꣯म् । वि । प्र꣣म् । आ꣢ । म꣣नीषि꣡ण꣢म् । पा꣡न्त꣢꣯म् । आ । पु꣣रुस्पृ꣡ह꣢म् । पु꣣रु । स्पृ꣡ह꣢꣯म् ॥११३८॥

Mantra without Swara
आ मन्द्रमा वरेण्यमा विप्रमा मनीषिणम् । पान्तमा पुरुस्पृहम् ॥

आ । मन्द्रम् । आ । वरेण्यम् । आ । विप्रम् । वि । प्रम् । आ । मनीषिणम् । पान्तम् । आ । पुरुस्पृहम् । पुरु । स्पृहम् ॥११३८॥

Samveda - Mantra Number : 1138
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे प्रभो! हम आपके इस सोम का वरण करते हैं जो - १. (आमन्द्रम्) = हमें सर्वथा आनन्दमय जीवनवाला बनाता है । २. (आवरेण्यम्) = जो सोम सर्वथा वरणीय है। हमारे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य सोम की रक्षा ही होना चाहिए । ३. (आविप्रम्)  जो शरीर को समन्तात्, विशेषरूप से पूर्ण करनेवाला है। सब रोगकृमियों को समाप्त करके शरीर को नीरोग बना देता है, मन में से भी द्वेषादि की भावनाओं को दूर करनेवाला है । ४. (आमनीषिणम्) = यह हमें सब विज्ञानों में विद्वान्, ज्ञानी बनाता है, ५. (आपान्तम्) = हमारी सर्वथा रक्षा करता है, ६. (पुरुस्पृहम्) = महान् स्पृहा [उच्च अभिलाषा] को जन्म देता है । यह उच्च अभिलाषा हमारी उन्नति का कारण बनती है । 
Essence
हम सोम को शरीर में ही सुरक्षित करते हैं तो यह हमारे जीवन को आनन्दमय बनाता है और हममें उच्च अभिलाषा को जन्म देता है ।
Subject
सोम का वरण