Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1134

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣢ वा꣣यु꣡मिन्द्र꣢꣯म꣣श्वि꣡ना꣢ सा꣣कं꣡ मदे꣢꣯न गच्छति । र꣢णा꣣ यो꣡ अ꣢स्य꣣ ध꣡र्म꣢णा ॥११३४॥

सः । वा꣣यु꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣श्वि꣡ना꣢ । सा꣣क꣢म् । म꣡दे꣢꣯न । ग꣣च्छति । र꣡ण꣢꣯ । यः । अ꣣स्य । ध꣡र्म꣢꣯णा ॥११३४॥

Mantra without Swara
स वायुमिन्द्रमश्विना साकं मदेन गच्छति । रणा यो अस्य धर्मणा ॥

सः । वायुम् । इन्द्रम् । अश्विना । साकम् । मदेन । गच्छति । रण । यः । अस्य । धर्मणा ॥११३४॥

Samveda - Mantra Number : 1134
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(सः) = वह व्यक्ति (यः) = जो (अस्य) = प्रभु के (धर्मणा) = कर्मों से (रणा) = रमण करता है— आनन्द का अनुभव करता है, अर्थात् प्रभु-प्राप्ति के लिए हितकर कर्मों में ही आनन्द लेता है, (वायुम्) = [वा गतौ] स्वभावतः क्रियावाले और सारे ब्रह्माण्ड को गति देनेवाले (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को (अश्विना) = प्राणापानों के द्वारा, अर्थात् प्राण- साधना के द्वारा (मदेन साकम्) - सदा उल्लास के साथ जीवन-यापन करता हुआ (गच्छति) = प्राप्त होता है । 

प्रभु-प्राप्ति का मार्ग यह है कि हम १. प्रभु से उपदिष्ट कर्मों में रमण करें- आत्मकि उन्नति के लिए किये जानेवाले कर्मों में हमारी रुचि हो, २. प्राणापान की साधना का हम ध्यान करें, ३. जीवन में सदा उल्लासमय रहने का प्रयत्न करें ।

प्रभु वायु हैं—हमें गति देनेवाले हैं और वे प्रभु ‘इन्द्र' हैं–परमैश्वर्यवाले हैं। ‘वायुमिन्द्रम्’ शब्दों का यह क्रम संकेत करता है कि गतिशीलता ही ऐश्वर्य प्राप्ति का साधन है।
Essence
१. हम प्रभु-प्राप्ति के साधनभूत कर्मों में आनन्द लें, २. प्राण- साधना करें, ३. सदा जीवन को उल्लासमय बनाने के लिए यत्नशील हों ।
Subject
प्रभु को कौन प्राप्त करता है ?